मैं कविता लिखती हूँ

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  मैं कविता लिखती हूँ

लोगो ने मुझसे पूछा,तुम ऐसी कैसी हो
बाहर से पिघला मक्ख,अंदर से मो जैसी हो |

इतनी कोमल भावना,तुम कैसे रखती हो
अनजान के दर्द में भी तुम सिसकती हो |

इस नश्तर जहा में,गर कदम तुम्हे रखना है
खुद के पैर जमाने,सशक्त तुम्हे दिखना है |

अभी इसी वक़्त तुम खुदको बदलो आज
नये जमाने में चलन का,हम तुम्हे देते राज़ |

मैं मृदुभाषी ,सबको हसाती रूलाती,कला की दासी
शोहरत का मोह नही,दो मीठे बोल की प्यासी |

जवाब में सबको मैं क्या और कैसे बता
कोमल हृदय की स्वामिनी,सबको कैसे समझा |

हमेशा मृदु मुलायम रहूंगी,खुदको बदल नही सकती हूँ
एसी इसलिए नज़रा,क्योंकि मैं कविता लिखती हूँ |

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