राधिका तारिणी

कृष्णा राधिका के निश्चल प्रेम को लेकर , स्नेह को देख कृष्ण भार्या रुखमिनी
के मन में हमेशा सवाल रहते.| राधिका का कभी द्वेष नही किया रुखमिनी ने,
मगर प्रभु से वह हमेशा पूछती, मैं भी आपसे असीम प्रेम करती हूँ प्रभु,
शायद राधिका जितना या उस से भी ज़्यादा,फिर क्यूँ आपके हृदय में राधिका
हमेशा विराजमान होती है ? मैं क्यूँ नही? मैं जानती हूँ आप मुझसे प्रेम करते है,
फिर भी स्नेह की हक़दार राधिका कैसे? इसी प्रश्न का जवाब कृष्णा ने एक
प्रसंग से रुखमिनी को दिया……

हे श्री कृष्णाजगत के पालनहार
जवाब चाहिए हमे पूछे रुखमिनी
क्यों करते हो स्नेह राधिका से इतना
मोह मेरा धरो ,मैं आपकी अर्धांगिनी
मन में मैं हूँ,दिल में राधिका का निवास
ऐसी दूरियाँ क्यूँ, मैं आपकी धारिणी
मिश्किल हस दिए प्रभु कुछ ना बोले
देख के रुखमिनी की और काटली तर्ज़ीनी 
लहू गिरता क़तरा क़तरा,चक्षु भरे नीर
डर गयी भार्या अचानक ये सब देख के
धीर देती स्वामी को अपने
वस्त्र ढूँढ लाती हूँ प्रभु की उंगल पर बांधने
कृष्ण की दर्द भरी आहे सुन
राधिका आई दौड़ के भाग के
एक पल गवाए बिना अपना उँचा वस्त्र काटा
मन को तस्सली मिली प्रभु के उंगल बाँध के
निशब्द देखे भार्या कृष्णाराधिका का स्नेह
अंतर्मन के भाव अब समझी रुखमिनी
समझ गया उसका मन अपने प्रश्न का उत्तर
दुख में प्रभु कृष्णा की सिर्फ़ राधिका तारिणी.

उस आसमाँ के परे

उस आसमाँ के परे रहनेवाले तुम
ना मिली हूँ,नही दीदार हुआ है तेरा
इन नैनो के ख्वाबो में तेरा हुआ बसेरा
जानते हो क्यूँ तेरे यादएहसास से  
हमारा मन खिलता है
समझो ना तेरे और हमारे दिल का रंग
कुछ कुछ मिलता जुलता है …….

मंदिर होये मूरत,हृदय बसे भगवन

मंदिर होये मूरत,हृदय बसे भगव

ये छोटिसी कहानी हमारी मा काफ़ी बार हम सारे भाई बहनो को दोहराती रहती है|
एक कस्बे में सुखी नामक बहू,अपने पति और साँस के संग रहा करती थी | उनकी
ईश्वर पर अटल श्रद्धा थी | लेकिन सांसजी को प्रभु पर कोई भरोसा ना था | किसी हादसे
वश वो अपना विश्वास प्रभु पर से खो  चुकी थी | हालाकी पतीजी ईश्वर को मानते थे |


    जब भी सुखी बहू ईश्वर का नाम स्मरण करने लगती,सांसजी टोक दिया करती|
गुस्सा हो जाती | सुखी बहू की जीवन में बस एक ही इच्छा थी,के पास के गा जाकर,
हा के हरी नारायण मंदिर के दर्शन करे,जो की काफ़ी जागृत देव स्थान माना जाता |
मगर अपनी नास्तिक साँस से कभी अनुमति नही माँग पाई |


    एक बार पतीजी लंबे अरसे बाहर देश गये | सुखी बहू दिन भर काम करती,प्रभु को 
याद करती,मिलने आने दो की रट सुनाती | सासू मा ने गुस्से में सुखी बहू को बँधवा दिया
 पेड़ से,कस कर रस्सिया बँधी | सुखी को ना वो खाना देती ना पानी | ‘अपने ईश्वर को
बुलाओ मद्दत के लिए ‘ इतना ही कहती | सुखी भी नारायण का जाप करे जा रही थी |


    आख़िर प्रभु को दया आही गयी सुखी पर |उन्होने पति का रूप धरा और पहुँचे,जहा 
सुखी को बाँध रखा था | हालचाल पूछा,क्यों बँधा पूछा?सुखी ने प्रभु मिलन की इच्छा प्रगट की |
पति रूप में जो प्रभु थे बोलेठीक है ,तुम सांसु मा को बिना बताए ही चली जाओ,तुम्हारी जगह
यहा हम रहेंगे,सब संभाल लेंगेतुम जाओ और उस पत्थर की मूरत के दर्शन कर आओ |”


   जैसे ही सुखी चली गयी,प्रभु ने सुखी का रूप धारण किया,खुद बँध गये,पेड़ सेसासू मा 
समझती ,सुखी ही है,रोज ताने कसति  उन पर.|प्रभु बस मिथ्या हंस पड़ते |
    इधर सुखी बहू मूरत के दर्शन कर खुश हुई | पर पत्थर की मूरत में ,उसे भगवान का तेज 
ना दिखाई दिया | कुछ गाववाले जो तीरथ से आए,उन्होने सुखी बहू मंदिर में होने की खबर 
सांसुजी तक पहुँचा दी |

सांसुजीविश्वास ना करे,कहे सुखी तो पेड़ से ही बँधी है |लोग भी जाते, देख कर हैरान हो जाते |

सुखी बहू घर लौटी ,तो दो दो सुखी को देख कर सारे लोग भ्रम पे पड़ गये | दो नो कहती मैं 
असली बहू हूँ | आख़िर हार कर असली सुखी बोली ‘प्रभु अब खेल बस,मैं मंदिर दर्शन तो
कर आई,पर आप मुझे वहा नही मिले,बस आपकी मूरत थी “.और रो पड़ी |


   प्रभु प्रकट हुए बोले ” सुखी बहू,इसलिए तो हमने कहा था,जाओ और उस पत्थर के मूरत के
दर्शन करो,आरे जब हम यहा है,आपके मन में है,वहा कैसे मिलेंगे |”इतना कह चले गये |
प्रभु दर्शन पाकर सारे लोग धन्य हो चुके थे |सासुमा को भी अपनी ग़लती का एहसास हुआ|
सुखी बहू को भी समझ आगया के प्रभु,हर हृदय में बसते है | चाहे वो इंसान का हो या किसी 
और प्राणी मात्र का | दिल से उन्हे याद करो,प्रभु ज़रूर भक्तो की पुकार सुनते है |


   हमारी मा अक्सर कहती है,प्रभु से मिलना हो तो मदिर जाओ ही,मगर किसी की मद्दत करो|
किसीसे दो मीठे लफ्ज़ कहो.किसी और के लिए भी कभी दुआ करो ,किसी की खोई मुस्कान 
लौटाओ,किसीकि तकलीफ़ समझो,प्रभु तुम्हे वही मिल जाएँगे |

कहा किस दिशा में खोजत 
कौन राह तू करेगा भ्रमण
दर्शन की प्यासी अँखियाँ तोरी
कितना खर्च करे वो धन |

लालसा ये जन्मी है अंदर
प्रभु मिलन को तरसात मन
जानत नायी कौनू ठा ठिकाना
इस चिंता मा  झुलस तन |

सारे जगत को भूले बिसरे
कर्म छोड़े,लगी ये अगन
प्रभु के गुण बखान करे 
सदा रखिए खुद को मगन |

एसो ढूँढन से नाही मिलत
प्रभु का होत सुनिश्चित स्थान
मंदिर मा छबि होवे मूरत
हर जीव हृदय बसे भगवन |

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तहु बाँसुरिया बजाओ कन्हाई

तहु बाँसुरिया बजाओ कन्हाई
राधा रानी छेड़त साज़

भगवन महू तोरी प्रीत अपनाई
संसार की मोहे कौनू चिंता नाही
मोहे चरण में बसैले बनाकर दास
तहु बाँसुरिया बजाओ कन्हाई
राधा रानी छेड़त साज़ |

महू  जग की सूदबुद खो बैठी
महू तोसे इक जिद्द कर  बैठी
मोहे लागी  तोसे मिलन की आस
तहु बाँसुरिया बजाओ कन्हाई 
राधा रानी छेड़त साज़  |

महू पूजा की रीत ना आई
जहु मन भावे ,भजन मा गाई
मोहे लागी तोरे दर्शन की प्यास
तहु बाँसुरिया बजाओ कन्हाई 
राधा रानी छेड़त साज़ |

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काहे तूने मटकी तोड़ी

काहे तूने मटकी तोड़ी

वृंदावन में फिर एक नयी सुबह खिली
सारी गोपिया पनिया भरन को चली

राह भर बतियाती इतराती चलती
कान्हा के गुणगान,शराराते बयान करती

दूर कही से नटखट कान्हा आए
कंकर से मटकी पर निशाना लगाए

एक ही वार में सारी मटकी फोड़ी
गोपिया पूछती,काहे तूने मटकी तोड़ी

यशोदा मैय्या को,शिकायत करवाएँगी
कान्हा को रस्सी से बन्धवाएँगी

कान्हा कहे,गोपियों मैं तुमसे रूठ जाउ
कसम से अब कभी बाँसुरी ना बजाउ

यह सुनकर गोपिया घबराए
बिन बाँसुरी रासलीला कैसे रचाए

सारी सखियाँ कान्हा को मनाए
नटखट चाहे तू हमे रोज़ सताए

बीनती करती ,बासुरी रोज़ बजाए
मधु धुन से सारे ब्रिज को सजाए.

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यमुना के तट पर

यमुना के तट पर
गोपियों का जमघट
वस्त्राभूषण रख कर
जलक्रीड़ा करती सब.
नटखट कान्हा आए
छुपता दबे पाव तब
देखे गोपिया है मगन
शरारत करने मचला मन
वस्त्राभूषण के साथ
एक पेड़ पर छिप गया
बहोत देर बाद
गोपियों के ध्यान आया
कान्हा को सब पुकारती
वस्त्राभूषण वापस दो कहती
हम सब बाहर कैसे आएँगी
नंदनवन वापस कैसे जाएँगी
कान्हा बोले मैं मान जाउ
पर अपनी एक शर्त मनाउ
यशोदा मैय्या से शिकायत ना करना
चाहे जितना मैं माखन चुराउ
मंज़ूर कह गोपिया शरमाई
नन्हा कान्हा,पर धूम मचाई.

उठो उठो गोपाला

उठो उठो गोपाला

पूरब में अरुण रथ आया ,लेकर किरनो का उजाला
भोर हुई अब , उठो उठो गोपाला, मेरे नंदलला |

जाग उठी है धरती सारी,जाग उठा चौपाला
जागो तुम भी , उठो उठो गोपाला,मेरे नंदलला |

दूध की नदी बहे , जागी है गौशाला
बाट देखे गौमता,उठो उठो गोपाला,मेरे नंदलला |

यशोदा मैय्या बनाए ,दही मक्खन का काला
ढूँढ रही तुझे,उठो उठो गोपाला, मेरे नंदलला |

हाथों में मेरी पूजा थाल सजी और जपमाला
दर्शन दे अब ,उठो उठो गोपाला,मेरे नंदलला |

prabhuji

मन मेरा नीत चपल चंचल
ईत उत हर पल भटकन
तेरे चरण,शरण आई प्रभुजी
रखियो मन तेरे जाप मा अटकन
बिनती इतनी लेकर आज
आई हूँ प्रभुजी तेरे द्वार
रहोगे ना मेरे संग सदा
आओगे ना मेरी सुन के पुकार

resham dor

हम सब बंधे हुए है
एक न दिखाई देनेवाले छोर से

हम महसूस करते है,मानते है
आत्मा में उनका निवास है

सुख हो या दुख
मन में कोलाहल हो या शांति

सदा हमारे संग चले
राह दिखाए भटके गर हम
आपने निर्मल व्यवहार से

करुणा उनकी अगाध है
सेवा भाव गर निस्वार्थ है

उनकी भक्ति में हो जायें विभोर
बधा रहे हमारा बंधन उनसे
जब तक है जीवन की रेशम डोर