रब्बा भले मैं क्यों ना सोती ही मर जाउँ |

रात प्रहर खुद को गहरी नींद में पाया
सपनो में हमसे मिलने साजन आया |

वक़्त का लम्हा था कुछ रुका रुका सा
नज़रों का परचम था झुका झुका सा |

मिलकर गाए मधुर सुर प्रीत के गीत
एक दिल जान हुए हम जो मिले मीत |

आँखें ना खोलूँगी उनसे ना बिछड़ जौउँ
रब्बा भले मैं क्यों ना सोती ही मर जाउँ |

सुबह का कोहरा

खोल दो अपनी पंखुड़ियों को 
हौले हौले एक के बाद एक 
फैलाओ अपनी बाहें इतनी 
सारी कायनात भर लो 
आशाओं के ख्वाब सजने दो 
मन को नित नयी सी 
अपने वजूद की धुन रचने दो 
हक़ीकत के पराग कन 
सच बनकर खिलेंगी
सुबह का कोहरा छटते ही
ओस की बूंदे मिलेंगी |

नज़दीकियाँ

 

 

 

 

जब मैं उदास होती हूँ 
मन में ही सिसकती रोती हूँ 
बिन कारण ही,ऐसे ही 
भावनाओ की नदिया में डूब जाती हूँ 
कोई आधार नही होता उन बातों का 
जानती हूँ , मगर फिर भी 
चली जाती हूँ उन राहों पर 
दिल हल्का हो जाता है 
उस वक़्त तेरी नज़दीकियाँ 
मेरा आधार बनती है 
मेरे जज़्बातों का आकार बनती है
तुम्हारा कुछ ना कह कर भी 
सब कुछ कहना, 
मेरी लहरों के बहाव को सहना 
महसूस करती हूँ मैं 
उस पल के सम्मोहन का
इंतज़ार करती हूँ मैं |

मासूम लम्हे

दिल के आँगन में
यूही कभी कभी
खेलते नज़र आते है
हुल्लड़ मचाते
खुद ही रूठते
खुद को ही मनाते
झगड़ते,जीतते,हारते
नीर बहाते,मीठे हसते
बिन कारण नाचते,गाते
दुनिया से बेख़बर
मदमस्त जीते,चलते
कुछ स्पष्ट,कुछ अस्पष्ट से
कुछ गहरे,कुछ बिखरे हुए
बचपन के मासूम लम्हे
और जब मैं
इनके पीछे भागती हूँ
उन्हे समेट लेना चाहती हूँ
उड़ -उड़ जाते है
इस फूल से उस फूल
अपने रंग फ़िज़ाओ में छोड़
तितली की तरह
कभी हाथ न आने के लिए |

ख्वाबों का आशियाँ

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नीली झील की सतह पर झूलता है वो जहाँ
हमारी मोहोब्बत से सज़ा  ख्वाबों का आशियाँ 

सूबह की सुनहरी किरने करती नृत्य झंकार
पवन हिचकौले , तन मन डोले ,छेड़े सुर सितार

रंग बिरंगी फूलों में थिरकन रचती फिर प्रीत
दिल की ल़हेरॉं में सिरहन  तू आए जो मधु मीत

 

पलकों के परदों में बंद है सारे पल -ए- गुलशन
तुमसे है साँसे सरगम, तुमसे ही साज़ –ए- धड़कन

खुद को देख रहे

imagesखुद को देख रहे
आईनें में इस कदर
वो अजनबी शक्स वहा
बैठा अंदर कौन
दावे बहुत किया करते
खुद से वाकिफ है

 आज राह देख रहे
उस अक्स से हमे भी

 कोई रूबरू करा दे…….

नन्ही चिड़ियाँ

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दरख़्त के घोसले में बैठी नन्ही चिड़ियाँ
घंटो नीले आसमान को तकती रहती

अपने खयालों को वो बहुत उंचा उड़ाना चाहती है |

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हमेशा गोल चाँद हमारे हिस्से होता
और आधा चकोर तुम्हारे हिस्से

वक़्त के साथ सिर्फ तुम्हारा चाँद बढ़ते देखा |

खुशी की तितली

खुशी की तितली
दिल के फूल पे
बैठी मुस्काये
सोचती निगोड़ी
उसका भंवर
अब नींद से उठ जाए

कुछ होगी गुफ्तगू
कुछ भंवर गुनगुनाए
मधुरस का आस्वाद
मदहोशी तक लिया जाए

ऐसी ही हो
हर सहर इनकी
दिल की पंखुड़ियो से
यही दुआ निकल जाए

खयाल

अरसा हुआ अलग है हमारी राहें

और हासिल कर ली हमने अपनी अपनी मंज़िले

खुशियों की तितलियाँ हमारे आंगन उड़ती है

तेरी यादे भी कोहरे में घुल गयी

फिर तन्हा लम्हो में क्यों

दिल को एक खयाल सताता है

के तेरे लबों पर अब भी कभी

क्या हमारा नाम आता है ?

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एक चुप्पी

एक चुप्पी
हमारे लबों पर बैठी
ताले सी

चाबी का गुच्छा
तेरी अल्लड मुस्कान
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