झुरियाँ

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झुरियाँ

“डाकिया” आवाज़ सुन
दौड़ के जाना चाहती आँगन
थके हुए कदम रुक रुक कर ही चलते
थैले से निकलते काग़ज़ देख चहेरा उत्सुक होता
झुरियों की हर लकीर मुस्कुरा के कहती
‘ ला दे हमारी चिट्ठी,पढ़ के भी सुनाइयो
कैसा है लल्ला,तबीयत ठीक,हालचाल बताईयो ‘
निर्विकार उत्तर ‘मनी ऑर्डर है,चिट्ठी नही ‘
यन्त्रवत उसके हाथ अंगूठा लगाते
हर महीने यही तो होता था
झुरियों पर उदासी के बादल मंडराते
सब देखता डाकिया,मन की नम आँखों से
ज़िंदगी के अनेक सपनो से बनी हर झुरी को
बेबस झुरियों के भाव शांत हो जाते
मगर,नीर रुकते नही,आस थमती नही
व्यस्त होगा लल्ला,शायद अगले माह…..


कुछ शब्द भेज दे……………….
 
 

 

 

अंधेरे से उजाले तक

है ना बहुत गहरा अंधेरा है,
तेरे आसपास का कुछ भी
दिखाई नही दे रहा
झुंझलाहट,क़ैद का आभास
अंधेरों में गुम होती आवाज़े
कोई रोशनदान भी नही
अगर तुम महसूस करोगे
सब की हालत तेरे जैसी है
कोई मद्दत के लिए नही आएगा
इधर उधर टुकूर -२  क्या देख रहे हो
मैं हूँ,तुम्हारे अंदर का चिराग
थोडिसी हिम्मत कर,जलाओ मुझे
धुआँ उठेगा,साँस चढ जाएगी
पर साथ थोड़ी रौशनी भी आएगी
वही तुम्हे राह दिखाएगी
अंधेरों से उजाले तक का
तुम्हारे अस्तित्व का सफ़र
तय करने के लिए….

 

 

मृगतृष्णा

कभी ख़त्म ना होनेवाला रेगिस्तान हो जैसे
अक्सर हमे जीवन के पल प्रतीत होते है ऐसे
उँचे तूफ़ानो के बवंडर ,दिल को झेले ना जाए
पराकाष्ठा हो प्रयत्नो की,पर वो थम ना पाए

रेत के नन्हे से कन हवाओ में उड़ते रहते है
हाथों पर ,पैरो पर,गालों पर ,होठों और नयनो पे
एक जुट होकर,सिमटकर, चिपक के बैठे रहते है
कोलाहल,अंतरंग शोर, मचा देते है छोटे से मन में

मन के पूरे बल से तूफ़ानो का सामना करना
अपनी दिशा कौनसी,किस और ये ग्यात करना
रेत के टीलो को बनाकर सहारा कभी लेना आराम
नयी उमीद की किरण दिखला जाए जरा सा विराम

चलते रहना हमेशा उस चमकीली ज़मीन की और
मृगतृष्णा हरा चाहे हो धोखा मगर जगाता एक आस
बरसात होगी तपती रेत पर , स्वप्न नज़र आए साथ
मंज़िल तक पहुँच जाएँगे,बुझेगी तकलीफ़ों की प्यास .

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_7282.html#mahak

पहला प्यार

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पहला प्यार  

 

जब भी देखूं तुम्हारी आँखों में
याद आते हैं वो गुजरे गुलाबी लम्हें
पहला प्यार जो हमारी ज़िंदगी में आया
उन हसीन घड़ियों में ,हमने तुम्हें पाया

 बरसातों के खुशनुमा मौसम
कुछ भीगे तुम, कुछ भीगे से हम
राह से चलते-चलते अनजाने से टकराए
ठंड से कपकपाते बदन, थोड़े से सहेराए
चहेरे से टपकती बूंदें, गालों पर लटों की घटायें
नयना मिले नयनों से, हम दोनों मुस्कुराए
सिमटकर अपनी चुनरी, शरमाये निकल गये थे।

घर पहुँचे लेकर तेरे उजले से साए
पलकों में बंद होकर साथ तुम भी चले आए
मुलाक़ातों के फिर शुरू रोज़ सिलसिले
दिल-ओ-जान हमारे, सदा ही रहे मिले
रेशम डोर से बँधकर, मिलकर ख्वाब सजाए
प्यार, समर्पण के भावना से गीत रचाए
तुम्हारे होने से जीवन के नज़रिए बदल गये थे।

इतना वक़्त जो तुम संग बिता लिया
हर लम्हा जिया वो था नया-नया
गुलशन-ए-बहार में खुशियों के फूल खिलाए
संभाला तुम्हीं ने हमें ,कभी कदम डगमगाए
सिखाया तूफ़ानो का सामना करना
संयम से अपने अस्तित्व को सँवारना
प्यार की गहराई के असली मायने समझ गये थे |

गुलाबी लम्हों को रखा संजोए
मन में उनको पल पल दोहराए
क्या पहला प्यार फिर हो सकता है?
होता है, आज मुझे हुआ है
दोबारा तुमसे…..

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/03/blog-post_5284.html

सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार

नीले नभ की छुपी नीलाई
शामल घटाए उस पर छाई
बदरा उमड़ घूमड़ कर आई
अपनी संगिनी को रहे पुकार
इठलाती,बलखाती थिरकत ताल
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

अपनी आने की आहट बताए
प्रकाश चमकती लकीरे बिखराए
खुश होती वो जब ये देखती
इंसानो में अब भी बसता प्यार
बदरा से करती इश्क़ इज़हार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

कोई सृजन पीड़ित नज़र आए
त्रिनेत्र को गहरी नींद से जगाए
करती उनके संग तांडव नृत्य
जब तक असत्य को ना जलाए
ख़त्म करना चाहे धरासे अत्याचार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

सत्य,अहिंसा विजयी हो जाए
सब के संग तब वो जश्न मनाए
हरित क्रांति का संदेसा पहुँचाती
बदरा से कहती अब बरसाए
शीतल बूँदो की मधुरस फुहार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

चाहे जितना हो उन में अंगार
बिजली नभ का गहना शृंगार
बिजली बिन बदरा लगे अधूरे
मिलकर दोनो करे सपने साकार
जीवन को दिलाए नया आकार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |
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नयी दिशा,नयी उड़ान

जीवन का एक और पन्ना पलट गया
अगला अध्याय लेकर आया, एक और साल नया

पिछला जो अच्छा है ,उसको साथ लेकर चलना
पिछला जो बुरा था, उसको नये साल में भूलना

नये सपनों के साथ हो तेरी नयी उमंगे
जीवन डोर वही पुरानी पर उड़ाओ नयी पतंगे

करके अपना बुलंद हौसला, आगे तुम राही बढ़ना
पिछली ग़लतिया ना दोहराए, उनसे सबक सिखना

जीवन में तूफ़ानो का सामना नयी हिम्मत से करना
खुद को कर मजबूत इतना, मुश्किलो से ना डरना

जीवन है अथांग सागर , सदैव इस में बहाना है
तेरी कश्ती को साहिलोपे,तुझे खुद संभालना है

प्रेमभाव, आदर, भक्ति, विश्वास पर सदा अटल रहना
किसीको बुरा लागे कभी, कोई अपशब्द ना कहना

ख्वाहिश और कोशिश की गठरी सदा संग रखना
अब गुजरा साल बीत गया,चढनी है नयी चढ़ान

एक नये क्षितिज की और तुम्हें है उड़ना
एक नयी दिशा में लेकर एक नयी उड़ान.

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