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एक दिन सोचा हमने,के बन जाए उदार
हम भी किसी को अपने पैसे दे उधार
तलाशते और ढूँढतेरहे इधर उधर
मिल गये एक गली में भैयाबाबू कामचुकार

हमने कहा उनसे,क्यों खटिया पर पड़े रहते
आने जाने वालों की चार बातें सुनते सहते
करो तुम मेहनत,करो कुछ काम
उधर दे रहे है ना ,हम तुम्हे अपने दाम

भैयाबाबू कामचुकार खुश हो गये बड़े
नमस्ते प्रणाम करने हमे हो गये खड़े
पैसे देकर हमने,बड़प्पन अपना दिखाया
खुश हुए मन मे,कामचुकार को सबक सिखाया

फिर ये सिलसिला चला हफ्ते दर हफ्ते
भैया बाबू हमसे पैसे लेकर जाते
कहते वो नयी नयी है बड़ा पाव की दुकान
हम खुश होते,जब वो बोले, हमारे कारण लोग करते उनका मान

काम में मसरूफ़ हम भी भूल गये
बड़े दीनोसे भैया पैसे लौटने नही आए
पहुँचे उस गली,जो लोगों से सुना,तो हमको लगा झटका
मौज मस्ती करके,बचे पैसे लेके,भैयाबाबू थे फरार
कान पकड़े हमने,तौबा अब कभी न देंगे उधार

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