ए ज़िंदगी

ज़िंदगी

सुबह तड़के
ठंड में सिकुडती बाहें
हाथों में दूध की बोतले लिए
हर दरवाज़े पर दस्तक देती
घूमती है ज़िंदगी
ताकि गहरी नींद में सोनेवालों
को जगाने के लिए
एक प्याला चाय बन सके

स्टेशन के प्लॅटफॉर्म पर
हाथो में ब्रश और कपड़ा लिए
आँखों में आधी नींद भरी
मुख पर थोड़ा काला पोलिश बिखेर
बैठ जाती है ज़िंदगी
और इंतज़ार करती है
किसी सफेद पॉश के जुते साफ़ हो
और मेरे घर का चूल्हा जले

ट्रॅफिक सिग्नल पर
होठों पे मुस्कान
और आँखों में आस लिए
अख़बार  बेचती हुई
भागती है ज़िंदगी
गाडोयोँ के पीछे

खुद की परवाह किए बिना
सोचती है मिर्च मसाला खबर बिके
और उसके घर में तेल आए
तो वो भी कुछ पढ़ सके
दिये के नीचे…..