झर झर शाख से

झर झर शाख से झरती हुई पत्तियाँ
हर एक पे तेरा नाम लिखने की कोशिश करती हूँ

और तुम हसकर इसे हमारा बचपना कहते हो…..
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तोड़ी थी अनगिनत पत्तियाँ एक एक कर
उंगलियाँ भी दर्द से करहाती

तेरे प्यार की गहराई को नाप न सके मगर …….

गुलमोहर तुम्हे मेरी कसम

गुलमोहर
तुम्हे मेरी कसम
सच सच बताना
तुम्हारे सलोने रूप की
छाव तले
जब शरमाई थी मैं
पहेली बार
क्या नही मची थी
केसरिया सनसनी तुम्हारे
मनभावन पत्तों के भीतर?
जब रखा था मैं ने
ज़िंदगी का पहला
गुलाबी प्रेम पृष्ट
क्या नही खिलखिलाई थी
तुम्हारी ललछोही कलियाँ?

गुलमोहर
सच सच बताना
जब पहली बार मेरे भीतर
लहरे उठी थी मासूम प्रेम की
तब तुम थे न मेरे साथ?
कितनी सिंदूरी पत्तियाँ
झरी थी तुमने मेरे उपर
जब मैं नितांत अकेली थी तो
क्यूँ नही बढ़ाया
अपना हाथ?

गुलमोहर
सच सच बताना
बस एप्रिल- मई में पनपते
प्यार के साथी हो?
जुलाइ-अगस्त के दिनो में
जब रोया मेरी आँखों का
सावन
तब क्यूँ नही आए
मुझे सहलाने?

गुलमोहर
सच सच बताना
क्या मेरा प्यार
खरा नही था?
क्या उस वक़्त तुम्हारा
तन हरा नही था,
क्या तब आकाश का सावन
तुम पर झरा नही था ?

कवियत्री – फाल्गुनी
(lokmat papar dec2010)

एक पुराना मौसम भीगा

दोस्तों में से ही किसीने ये कविता ईमेल से भेजी थी,हमे नाही कवी का नाम पता है,नाही ये कही और प्रकाशित हुई है क्या इस बात की कोई जानकारी ?बस मगर दिल को बहुत अच्छी लगी तो आप सब से बाट रहे है |
अगर किसी को इस कविता के लेखक के बारे में या और कुछ भी जानकारी हो जरूर बताए,आखिर सारा श्रेय उन्ही का है |

एक पुराना मौसम भीगा ,अनजानी बरसातों में
जाने लेकर कौन चला है , ओढ़ा बादल हाथों में |

इक मौसम में पतझड़ के दिन,इक मौसम में फूलों के
कितना सारा फर्क है आखिर ,तेरी ही सौगातों में |

अपनी आँखों में हर मंजर् , अब अनदेखा रहता है
कोई झील-मिल सी रहती है,ख्वाबों की बारातों में |

सब्र -आलम क्या होता है , यारो हम से पूच्छो तो
कतरा-कतरा शबनम चुनना, हिज्र की लम्बी रातों में |

नववर्ष की आप सभी को हार्दिक बधाई

नववर्ष की आप सभी को हार्दिक बधाई |
पीछे मुड़कर मन में झाका ऐसा लगा जैसे सारे पल अभी अभी तो गुजरे है | कुछ खट्टे,कुछ मीठे,अच्छी यादे साथ लिए चलेंगे,काटों को पीछे छोड़,खुशी के गलियारे पर मुड़ने को तैयार |
इस साल के आखरी छह महीनो में हमारा कलम से जैसे नाता ही टूट गया,वादा तो नही मगर कोशिश जरूर रहेगी के अगले साल ज्यादा लिखूँ|व्यस्तता या कहे ज़िम्मेदारियाँ या थोडा हमारा आलसीपन भी कारण रहा होगा.मगर कसम से जब भी वक़्त मिला हम अपने दोस्तों का ब्लॉग जरूर पढ़ते,चाहे कॉमेंट करे ना करे,वही तो स्त्रोत है जो हमे आप सब से जोड़के रखता है |

सोचती हूँ इस मोड़ ठहर जाउ यहाँ

मिलु और कहू कुछ अपनी सुनू कुछ आपकी

इन गुलाबी रिश्तों पर नाज़ है दिल को |


दीपावली की हार्दिक शुबकामनाए

ज़िंदगी के पहिए कुछ ज्यादा ही रफ्तार से चल रहे है | काम फिर बीच का टाइम मिलता तब घर की सफाई,थोड़ी घर की बनी दीपावली के लिए मिठाई,नमकीन, आज कल,आज कल करते करते त्योहार आ भी गया | सब कहते थे ,महक वजन कम करो,चार पाँच किलो तो बढ़ ही गया है | अब तक बहुत कंट्रोल किया खाने पर,एक या डेढ़ किलो से ज्यादा कम नही हुआ | अब और कंट्रोल नही होता ,दीवाली की मिठाई तो खाने के लिए ही होती है 🙂 :),है न |

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुबकामनाए.

अजीब रिश्ता

आज बाप्पा का विसर्जन दिन,ऐसे लगता है जैसे कोई अपना घर से विदा हो रहा हो | फिर भी कहते है गणेश जी आज खुश रहते है,उनकी माँ से मिलने दौड़े जाते है | अब खाली हाथ तो नहीं भेजा जा सकता ,सो करंजी का प्रसाद साथ में बाँध कर ले जायेंगे | फिर अगले साल जल्दे aane के लिए कहना नहीं भूले हम |

लाखों भक्तो की इतनी सारी डिमांड्स न जाने कैसे पूरी करते होंगे ? आज तो बस हुश स्स्स्स जान में जान आई होगी उनके:) | एक दोस्त बीमार है,और यहाँ अकेली रहती है,सो हम उन्हें घर ले आये | कल से जरा उनकी तबियत जरासी ठीक है | खाने में फिर आलू पराठा,और मटकी और गरमा गरम दाल,चावल बनेंगे | हफ्ते भर से कोई बारिश नहीं ,गर्मी बेहद है | बादल का एक टुकड़ा भी दिखा तो आस लगी रहती है |

कितना अजीब रिश्ता है तुमसे

के तेरे आने न आने से बदल जाता

एक नज़रिए का खेल सारा ,और क्या ….

नैनो से नैना लड़ा दे साकी

 

नैनो से नैना लड़ा दे साकी
गुमशुदा होश, इतनी पीला दे साकी

ख्वाब भी हक़ीक़त बन उतरे यहा
ऐसी रौनक-ए-महफिल बना दे साकी

दिल-ओ-आईना-ए-तस्वीर दीवानापन
उन्हे हम  पे है यकीन बता दे साकी

जब से बड़ी हुई हूँ

धरती पर कदम रख चलती हूँ
उसी की गोद से निकला
अन्न जल ग्रहण करती हूँ
उसकी वायु से सांस लेती हूँ
ये जीवन उसी की देन
फिर भी क्यूँ हर रात
जब निलय नभ को देखती हूँ
मन उसी और दौड़ता है
वो चवन्नी सा चाँद
बिंदिया से सितारे
वही सारा जहान लगते है
दिल आवाज़ देता है,
फैला दो अपनी बाहें और समेट लो
ये चमकीला आकाश बाहों में
वो गैर पास आता नही
फिर धरा पर ही सो जाती हूँ
सोचते हुए , 
कितनी मतलबी हो गयी हूँ, 
जब से बड़ी हुई हूँ |

बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई

बहुत खामोशियाँ बिखरी हुई आसपास
दिल की धड़कन सुनाई ना दे
किस आवाज़ का आगाज़ 
ज़िंदगी को न मालूम
वो चुपचाप खड़ी है दरवाज़े पे……..

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हम खुद गये थे
वो दीवार फांदकार
रिश्तों की पुरानी परतों पर्
नया मूलामा चढ़ाने
प्यार के चुने से
चिपकाए एहसास
रंगों का चुनाव सबका
अलग था मगर…………………

बूंदो की खनक में

 

बूंदो की खनक में
 ढूँढती हूँ अक्सर
वो छुपा हुआ अक्स तेरा
तुम भी जब खिलखिलाते
जैसे छम छम बूंदे
बजती थी |

बरसात की बूंदे
हथेली पर् लेकर
एक कोशिश करती हूँ
उन्हे छुपाने की
ताकि बहते पानी संग
तुम भी न बह जाओ |

बूँद में तुम्हे देखना
खयाल अच्छा लगता है
जितनी बूंदे होती है
तेरी उतनी ही तस्वीरे |

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