सुबह का कोहरा

खोल दो अपनी पंखुड़ियों को 
हौले हौले एक के बाद एक 
फैलाओ अपनी बाहें इतनी 
सारी कायनात भर लो 
आशाओं के ख्वाब सजने दो 
मन को नित नयी सी 
अपने वजूद की धुन रचने दो 
हक़ीकत के पराग कन 
सच बनकर खिलेंगी
सुबह का कोहरा छटते ही
ओस की बूंदे मिलेंगी |

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मन की आशायें

मन की आशायें भी
बड़ी अजीब होती है
शाम ढलते ही नीम तले
जाकर खड़ी हो गई
सोचती है गर टहनी टूटी तो
उसपर बैठा चाँद
उनकी झोली में गिरेगा |

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कल हमने चाँद को देखा
बादलों की चादर से झाकता ,मुस्काता
,फिर छुप जाता
बार बार यही हरकत दोहराता
शाम ढल रही थी वही
सूरज डूब रहा  था दूसरे छोर
निशा की पायल खनकी
मगर वो शरारती बाज ना आया
हमसा ही कह रहा था
सोने दो ना और पाँच मिनिट बाकी है
रात होने में अभी….

दीप तुम जलते रहना यूही निरंतर

नन्हे से दीपक में सजाई बाती
रौशनी चारों तरफ,निखरी हुई ज्योति
हर पल तप तप कर तुम हो जाना प्रखर
दीप तुम जलते रहना यूही निरंतर |

अंधेरी गलियों में जो हम भटक जाए
तेरे उजियारे से मन की प्रज्वलित हो आशायें
मुश्किलें आए तो साथ निभाना शामसहर
दीप तुम जलते रहना यूही निरंतर |

तूफानो के काफ़िले आएंगे गुजर जाएंगे
कोशिश होगी तुम बुझ जा,चुभेंगी हवायें
विश्वास के बल पर  हो जीवन का सफर
दीप तुम जलते रहना यूही निरंतर |

अपने लौ को सदैव मध्यम ही जलने दो
प्रकाश पर खुद के कभी घमंड  हो
प्रेरणा बनो सबकीदिखाना राहनज़र
दीप तुम जलते रहना यूही निरंतर |