आधा चाँद

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तुम हमे आज कल वैसे ही अच्छे लगते हो
आधे अधूरे ,
हम तुम में अपनी भावनाए भर दे
और तुम हम में जज़्बात भरो
ताकि कुछ लेन देन होता रहे
तुझ में और हम में जुड़े रहने के लिए
इसीलिए पूनम की चका चौंध रौशनी से
ज़्यादा कुछ रीता कुछ खाली सा
आधा चाँद ही भाता है मन को
आसमान से छन छन कर आती उसकी किरने
सहेला देती है दिल के उस कोने को रोज रोज
साथ देती है हर रात,
जहा तुम रहते हो…..

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न जाने क्यों

 जाने क्यों

वो ये कैसे सोच लेता है के
उसके हर जज़्बात हमारा दिल समझता है
साथ होकर भी तरन्नुमखामोशी का साज़
हमे हरदम नागवारा लगता है
कहेने को बीच में अनगिनत बातें राह देखती
वो बस कभी आसमान  को कभी हमे तकता है
हालातआलम बदलते नज़र नही आते
छेड़ो ना वही आलाप जो रूह में बसता है
 जाने क्यूँ डरती हूँ तुमसे आशिक़ –हयात
अनकहा सा ये लम्हा रेत सा फिसलता है |

मुक्ति

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मुक्ति

1. भोर की लालिमा             
मन में असीम भक्ति
हाथों में पूजा थाल
तुलसी की परिक्रमा
मंत्रो का उच्चारण जाप
शन्खो का नीनाद
भजन स्तुति गा
प्रभु में विलीन हो जा
मुक्ति चिन्ताओ से |

2. नारी हूँ मैं
देवी का रूप हूँ मैं
जग की जननी हूँ मैं
ममता की मूरत हूँ मैं
समाज से पीड़ित हूँ मैं
पूजते है,जलाते भी है
अपनाते है,छलते भी है
सब की हूँ,मेरा स्वयं
अस्तित्व भूलते  है
हा आज चाहती हूँ मैं
मुक्ति दोगले विचारो से |

3. विशाल अंबर
बस यूही निहारूं
मन ही मन में
उसे छूकर 
पिंजरे में बंद हूँ
कैसे उड़ जा
आवाज़ दब गयी
आस तड़प बन गयी
स्वन्द उड़ना चाहूं
पंछी की आज़ादी पा
मुक्ति क़ैद से |

4. कालचक्र सदैव कार्यरत
ये जीवन पूर्ण ताहा जिया
अंतिम पड़ाव अब आया
अनकहा संदेसा संग लाया
मो जीने का और बढ़ाया
सच से किसने धोका खाया
आख़िर सबने इसे अपनाया
एक दिन जीवनधारा रूठेगी
सांसो की डोर कभी टूटेगी
सब कुछ खामोश
रह जाएगा सन्नाटा
अभिलाषा मोक्ष प्राप्ति की
मुक्ति जग से |

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आज जाने की ज़िद्द ना करो

आज जाने की ज़िद्द ना करो

लगता है जैसे अरसो पुरानी बात है
गमो के साये सदा हमारे साथ है |

तमस की वो बेबसी,और वो तन्हाई
तरस गया मन सुनने,स्वरो की शहनाई |

महलो में रह कर भी, दामन खाली थे
दिपो की माला थी,पर रास्ते बंद थे |

तुम्हे ढूँढने तो , आसमान भी झुक गये
जहा छोड़ी थी राह , हम वही रुक गये |

आज मेरे सरताज , जो तुम आए हो
प्यार के मधुबन , अपने साथ लाए हो |

सोला शृंगार किये , मेरे मंन की बात हरो
प्रियतम,आज जाने की जिद्द ना करो |

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फ़िज़ा

फ़िज़ा

यूँ ही आज ख़याल आया , देखु रूप पलटकर
कुछ पल महसूस करू , फ़िज़ा में बदलकर |

फ़िज़ा बनकर मैं , आज़ाद हो चुकी थी
इस ज़मीन से अपना रिश्ता खो चुकी थी |

हवाओं संग कही भी झूमती जा रही थी
पीछे पीछे मेरे , महकती ताज़गी आ रही थी |

घटाओं संग आसमान की सैर करने निकलती
कभी पंछी सी उड़कर , किलबिल करती चहेकती \

शाम को थक कर , जब ढूँढा अपना तिकाना
कही भी नज़र ना आया मेरा आशियाना |

जैसी थी वैसी अच्छी , फ़िज़ा बन भटकना दर बदर है
समझ गयी मैं, आसमान नही , ये ज़मी मेरा घर है |

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