किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ

देखा नज़र भर के तुझे जमाना हुआ
हमारी रुसवाईयों का सबब पुराना हुआ |
हम कब के भुला चुके तीर-ए-नश्तर
नफ़रत-ओ-गुबार दिल से रवाना हुआ |
दुनिया की दौड़ में हो गया शामिल
इंसान खुद की शख्सियत से बेगाना हुआ |
वो तो यूही किसीने जिक्र किया तुम्हारा
छुपाए राज़-ए-इश्क़ तब बताना हुआ |
मुश्किल गलियों से तेरी दहलीज़ तक पहुँचे
दीदार-ए-आफताब नाहो साजिशन सताना हुआ |
रस्मो की जंजीरे तोड़ के निकले जो
राह-ए-वफ़ा तय उनका गुजर जाना हुआ |
यादों और ख्वाबो में मिलने आओगे कभी
फ़िज़ूल ही झिलमिल अरमानो को बहलना हुआ |
सच्चाई को गले लगाना सिख ले “महक”
किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ |

 

 

 

 

 

 

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गुलमोहर

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 सी शीश है तुझमें ,खिची चली आती हूँ
साथ मेरे मन की तरंगे, तुमसे बाटने  लाती हूँ |

तुमसे मेरा रिश्ता है , मेरे बचपन सा सुहाना
तेरे रंगरूप से मोहित मैं,सुनती हूँ तेरा तराना |

फ़िज़ाओं का रंग बदले,मौसम भी बदलता रेहता
जब तूमपे बहा सजती,मेरा रोम रोम है खिलता |

ग्रीष्म ऋतु में आते हो,सावन की ख़ुशी दे जाते हो
जहाँ भी जाती हूँ मैं,मेरे मन में समाए होते हो |

ना जानू तुम कौन हो मेरे,प्रियतम या सखा हो
बेनाम ही रेहने दो ये रिश्ता,नाम में क्या रखा है |

इतना समझती हूँ मैं,बरसों का अपना अफ़साना
 जब भी तेरी छाया में,हरदम प्यार के फूल बरसाना |

ज़िंदगी की  मुश्किल राहों में , तेरे फूल चुन चुन लाती हूँ
तेरे संग होने के एहसास से ही,कितना सुकून पाती हूँ |

लालरे फूलपन्नो की चुनरी से,तेरा रूप ग़ज़ब का निखरता है
मेरे दिल के आँगन में आज भीवो गुलमो बिखरता  है |

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