हाल-ए-दिल

हालदिल बयान कर रहे थे जब हम अपना
पाकमोहोब्बत है तुमसे ये मान लिया होता |
किसी भी हद्द से गुजर जाने का जुनून सवार
दावा सच्चा है हमारा कोई इम्तेहान लिया होता |
तेरे आने से पूरे हुए बहुत से अरमान हमारे
कितने रह गये बाकी ये जान लिया होता |
दिल में कभी  जगती वो तन्हाई की हसरत
भीड़ में गर तुमने हमे पहचान लिया होता |
 

 

 

 

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किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ

देखा नज़र भर के तुझे जमाना हुआ
हमारी रुसवाईयों का सबब पुराना हुआ |
हम कब के भुला चुके तीर-ए-नश्तर
नफ़रत-ओ-गुबार दिल से रवाना हुआ |
दुनिया की दौड़ में हो गया शामिल
इंसान खुद की शख्सियत से बेगाना हुआ |
वो तो यूही किसीने जिक्र किया तुम्हारा
छुपाए राज़-ए-इश्क़ तब बताना हुआ |
मुश्किल गलियों से तेरी दहलीज़ तक पहुँचे
दीदार-ए-आफताब नाहो साजिशन सताना हुआ |
रस्मो की जंजीरे तोड़ के निकले जो
राह-ए-वफ़ा तय उनका गुजर जाना हुआ |
यादों और ख्वाबो में मिलने आओगे कभी
फ़िज़ूल ही झिलमिल अरमानो को बहलना हुआ |
सच्चाई को गले लगाना सिख ले “महक”
किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ |