सखा पलाश संग तुम्हारे

सखा पलाश संग तुम्हारे

बचपन से रिश्ता है ना
तुमसे मेरा और मुझसे तुम्हारा
नैनिहाल के आँगन में
पनपा ये स्नेह प्यारा
अजीब सी कशिश,मीठा एहसास
साथ तुम्हारा,सबसे न्यारा
झुलसाती  दोपहर ,गरम हवायें
तनमन में जब आग लगाती
मनमोहक पुष्प गुच्छ तुम्हारे
ठंडी छाव पास बुलाती
तुम संग अपने खेल रचाती
तुमसे दिल की कुछ 
कही अनकही बातें बतियाती 
आज फिर वही मौसम लौट आया है
ग्रीष्म का,पलाश के फूल खिलने का
और लौट कर आई हूँ मैं भी
पास तुम्हारे,वही अपनापन पाने
जो तुमसे मुझे मिला पल पल
आई हूँ स्नेह पर तुम्हारे
अपना हक्क जताने
उस वक़्त को वापस बुलाने
जो बिता
सखा पलाश संग तुम्हारे
चलो  आज फिर जी लेते है
रेशम बन्ध पुराने हमारे
भूले तो नही हो मुझे
अपनी पहचान बताई मैने तुम्हे छूकर
तुम भी मुझे अपनाओ सखा
पलाश का फूल मेरी अंजनी में रख कर.

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गुज़रे लम्हे बचपन के

गुज़रे लम्हे बचपन के वो
बस याद बनकर रह गये
फरिश्तो के सपने देखे थे
जवानी में कही ढ़ गये
जो भी सुंदर अरमान थे
जहाँ की बाढ़ में बह गये
कभी लौटेंगे ना नन्हे पल
सदमा ये भी हम गये.|

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