पवन बासूरी

पवन बासूरी

भोर की रंगों से सज़ा गगन
सुनहरी रश्मि का  आगमन
कीलरव से चहेका चमन
अंगड़ाई ले जागा मधुबन
अध खुले अध खिले  सुमन
शरारत भरी थोड़ी चुभन
पंखुड़ियों पर रेशम छूअन
पुलकित रोमांचित करता तनमन
बासूरी पर छेड़ी प्रीत गुंजन
प्यार महकाता नटखट पवन 

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काहे तूने मटकी तोड़ी

काहे तूने मटकी तोड़ी

वृंदावन में फिर एक नयी सुबह खिली
सारी गोपिया पनिया भरन को चली

राह भर बतियाती इतराती चलती
कान्हा के गुणगान,शराराते बयान करती

दूर कही से नटखट कान्हा आए
कंकर से मटकी पर निशाना लगाए

एक ही वार में सारी मटकी फोड़ी
गोपिया पूछती,काहे तूने मटकी तोड़ी

यशोदा मैय्या को,शिकायत करवाएँगी
कान्हा को रस्सी से बन्धवाएँगी

कान्हा कहे,गोपियों मैं तुमसे रूठ जाउ
कसम से अब कभी बाँसुरी ना बजाउ

यह सुनकर गोपिया घबराए
बिन बाँसुरी रासलीला कैसे रचाए

सारी सखियाँ कान्हा को मनाए
नटखट चाहे तू हमे रोज़ सताए

बीनती करती ,बासुरी रोज़ बजाए
मधु धुन से सारे ब्रिज को सजाए.

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