बेटी

बेटी तू हमारी लाडली बस कहने को कहते है सभी

सोने के पिंजरे में रहती हूँमेरी भावनाए दबी

पंख दिए है उड़ने के लिए

मगर आज़ादी देना भूल गये

मैं भी गगन में विहार कर सकती हूँ

एक विश्वास जताना भूल गये

मुझे भी जाने दो अपना जहाँ खुद बना लूँगी 

वादा करती हूँ कामयाब लौट के उंगी

थोड़ी कोशिश करने दो ,हार और जीत देखनी है 

दुनिया के तजुर्बे सीखने है

बस एक मौका चाहिए ,देंगे ना …… 

 

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समान विषमता

समान   विषमता 

बापू और अम्मा का छोटा परिवार
एक बेटी एक बिटवा दो ही बच्चे हमार
कहते है सबसे दोनो को खूब पढ़ाएँगे
उँचे ओहोदे पर, दोनो को बिठाएँगे
बेटी क्या बेटा क्या हम को है समान
हमारे दो  लाड़ले है इसका प्रमाण
सुन ओ ताया,सनरी ओ ताई
मुन्नी, बबुआ है जुड़वा बहेन भाई. |

बाज़ार से बापू जब लौटकर आए
साथ में ढेर सारे खिलौने लाए
बबुआ को अपने पास बुलाया
हाथों में उसके एक गुलेल थमाया
पीछे से मुन्नी की आवाज़ आई
बापू एक गुलेल  हमका भी चाही
ये खेल हम भी खेलत है अच्छा
बबुआ से हमार नीशाना है पक्का
नही  ये है लड़कन का खेल
तू लड़की देख तेरे लिए गुड़िया है लाई
मुन्नी, बबुआ है जुड़वा बहन भाई. |

घर में अचानक आए मेहमान
चल रे मुन्नी हाथ बटा बहुत पड़ा काम
बनानी रसोई,दिया क्या सुनाई
अम्मा मुन्नी पर ज़ोर से चीलाई
दौड़ दौड़ के मुन्नी जल्दी से आई
बबुआ को संग बुला अम्मा काम जल्दी निबट जाई
परीक्षा चल रही उसको करने दे अभ्यास
अव्वल नंबर लाने उसको करना है सराव
कल गणित का पर्चा मेरा ,फूटी मुन्नी की रुलाई
मेरी भी तो अम्मा रही अधूरी पढ़ाई
मुन्नी,बबुआ जुड़वा बहेन भाई. |

सोचती मुन्नी कैसे है ये आधुनिक विचार
अपनो से पाया उसने दोगला व्यवहार
समानता का बस उपर उपर का कहलावा
आधुनिकी करण का कैसा ये दिखावा ?
हम पर कित्ते बंधन,बबुआ को क्यूँ है छूट
नन्हा सा मन अपनो से गया रूठ
लाडली हूँ घर की,फिर भी बोलत हो पराई
ये समान विषमता घर में हर बेटी ने पाई
मुन्नी ,बबुआ जुड़वा बहेन भाई. |

sone ka pinjar

सारे ऐहीक सुख है उसके पास
किसी चीज़ की नही है कमी
सोचती क्या किस्मत उसने पाई
सोने की दुनिया,उसके हिस्से आई
बास कुछ केहने की देर
सब तुरंत मिल जाता
फिर उसके चेहरे पर
वो नूर क्यों नही आता ?
जिस नसीब पर उसे था नाज़
उस पर ही रोना आता क्यों आज
वो एक आज़ाद पंछी है,रहती वो आसमान पर
ये सोने का पिंजर ,कैसे हो गया उसका घर?
खोल दो ये क़ैद का बंधन
कर दो उसे आज़ाद
फैलाने दो उसे वो पंख
हवा को चिरती उसकी उमंगे
उड़ने दो उसे भी उनके संग
देखने दो उसे,उँचाई से ये मंज़र
उपर किरनो की बाहे,नीचे गहरा समंदर
खोजना है उसे,एक नया आकाश
तलाश करना है अपना अस्तित्व
बनाना है ख़ुद का .व्यक्तित्व

हाइकू- नारी

हाइकू- नारी

1. ममता से भरी
    अन्नपूर्णा कहलाती है
    जन्मदात्रि

2. जिसके बिना
    सारा जग सुना सुना
    मा है वो

3. कलाई पर राखी
    भाई की दुलारी
    बहन वो

4. लक्ष्मी सी आई
   खुशियों का धन लाई
   बेटी वो

5. समर्पित सदैव
    विश्वास पर खरी
   अर्धांगिनी

6. पूजनीय सबकी
    आदरभाव जिसके लिए
    देवी वो

7. बिदाई की रस्म
    जग की रीत है
    बेटी रोए

8. अपनो के गम
    आँचल में छुपाती
    धरती जैसे

9. चाँद पर आज
    रखा कदम नारी ने
    बढता हौसला

10. चाहत उसकी
      दिवानगी की हद तक
      प्यार की मूरत.

sone ka pinjar

सारे ऐहीक सुख है उसके पास
किसी चीज़ की नही है कमी
सोचती क्या किस्मत उसने पाई
सोने की दुनिया,उसके हिस्से आई
बास कुछ केहने की देर
सब तुरंत मिल जाता
फिर उसके चेहरे पर
वो नूर क्यों नही आता ?
जिस नसीब पर उसे था नाज़
उस पर ही रोना आता क्यों आज
वो एक आज़ाद पंछी है,रहती वो आसमान पर
ये सोने का पिंजर ,कैसे हो गया उसका घर?
खोल दो ये क़ैद का बंधन
कर दो उसे आज़ाद
फैलाने दो उसे वो पंख
हवा को चिरती उसकी उमंगे
उड़ने दो उसे भी उनके संग
देखने दो उसे,उँचाई से ये मंज़र
उपर किरनो की बाहे,नीचे गहरा समंदर
खोजना है उसे,एक नया आकाश
तलाश करना है अपना अस्तित्व
बनाना है ख़ुद का .व्यक्तित्व

babul

नयनो की जलधारा को, बह जाने दो सब कहते
पर तुम इस गंगा जमुना को मेरे बाबुल कैसे सहते
इसलिए छूपा रही हूँ दिल के एक कोने में
जहाँ तेरे संग बिताए सारे पल है रहते
होठों पर सजाई हँसी,ताकि तू ना रोए
इन आखरी लम्हों को,हम रखेंगे संजोए
आज अपनी लाड़ली की कर रहे हो बिदाई
क्या एक ही दिन मे, हो गयी हू इतनी पराई
जानू मेरे जैसा तेरा भी मन भर आया
चाहती सदा तू बना रहे मेरा साया
वादा करती हूँ निभाउंगी तेरे संस्कार
तेरे सारे सपनो को दूँगी में आकार
कैसी रीत है ये,के जाना तेरा बंधन तोड़के
क्या रह पाउंगी बाबुल, मैं तेरा दामन छोड़के.