शाम सुहानी सी

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शाम सुहानी सी

धूप की चादर को हटाकर बिखर गये नीले स्याह से बादल
गरजत बरसात बूँदों का आना ,गालों पर सरका आँख का काजल |

ठंडी हवाओं का नज़दीक से गुज़रना नस नस में दौड़ती सहर
आँधियों का हमे अपने आगोश में लेना दिल में उठता कहेर |

उसी राह से हुआ तेरा आगमन ,एक छाते में चलने का निमंत्रण
नज़दीकियों में खिला खिला मन फिर भी था खामोशी का अंतर |

यूही राह पर कदम चले संग तुम्हारे कभी ना आए वो मंज़िल
बड़ी अजीब सी चाहत ,ख्वाब होते गजब के जो इश्क़ में डूबा हो दिल |

दरवाज़े तक तेरा हमे छोड़ना और मुस्कान में कुछ कोशीशन कहेना
समझ गया दिल वो अनकहे अल्फ़ाज़ और चलते हुए तेरा तोडसा रुकना |

हमशी  कह दू राज़ की बात ,ज़िंदगी की सब से थी  वो शाम सुहानी सी
रब्बा  शुक्रा में जीतने सजदे करूँ कम है उस  वक़्त तूने दुआ कबुल की |

बदरा दीवाने

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जानते हो तुम कितना गहरा असर होता है तुम्हारा हम पर
तुम बरसते हो कही दूर और हरियाली इस पार छा जाती  है|

 

 तपती बिलखती धरा मनाए नही मानती किसी की बात
सिर्फ़ तुम्हे देख  बदरा दीवाने उस पे मुस्कान आती है |

 

क्यूँ अकेला छोड़ उस को तू मुक्त विहार करता फिरता है
तेरा धरा से बूँदों का संगम जब होता खुशहाली लाती है |