बादल मितवा

राह देखे मन प्रतिपल हर क्षण
ढूँढे तुझे मेरा बिखरा कन कन

नही सुने जाते जमाने के ताने
उस पर  आने के तेरे लाख बहाने

आँखें है बंजर ,कैसे नीर बहाए
सुलगती किरने आकर तनमन जलाए

तुझसे मिलने करूँ सागर का मंथन
धरा हूँ , मुझे है उड़ने का बंधन

ब्रम्‍हांड में पूरे तेरा है विस्तार
मुक्त अकेला ही करता है विहार

सुन रहे हो क्रंदन मत सता रे
कुछ लम्हो की साँसे अब तो आरे

मोहोब्बत का वास्ता तुझे धड़कन पुकारे
बादल मितवा प्यार की बूंदे बरसा रे.

उन ओस की बूँदो का आना

उन ओस की बूँदो का आना

लालिमा की चुनर पूरब पर लहराए
मंद मंद बहती ये शीतल हवाए
खिली कुसुमीता मध्यम मुस्कुराए
फ़िज़ाए जब उसे छूकर गुजरती
अपनी महक हर दिशा में बिखराए
छम छम करती किरनो की पायल
रौशन करती जीवन का हर पल
कही दूर से आए बासूरी की गूंजन
उल्हासित,प्रफूल्लित होता ये मन
कही पंछीयो का किलबिल चहकना
पन्नो का सरस्वति के राग छेड़ना
नाज़ुक , तरल , हसती , दर्पणसी
उन ओस की बूँदो का आना
अपना प्यार पंखुड़ियो पर जताना
ओस की दर्पण में तुम नज़र आते हो
हर बूँद के साथ अपना प्यार दे जाते हो
तुम्ही हो मेरे इस जीवन की आकांक्षा
इसलिए हर सुबह सिर्फ़ तुम्हे देखने
करती हूँ ओस की बूँदो की प्रतीक्षा.

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