मन पखेरू उड़ जा

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मन पखेरू उड़ जा

मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस
बरस पर बरस बीत रहे पिया भए परदेस |

मिलते ही उनसे ये कहना
तुझ बिन मुश्किल है अब रहना
दिल रे , तू धर ले उनकी धड़कन का भेस 
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |

यादों से भी हुई है अनबन
छोड़ गयी हमे बना के बिरहन
एक नज़र मिलाउँ उनसे , कोई इच्छा ना शेष
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |

चिट्ठी में लिख लाना उनकी बातें
साथ लै आना मोहोब्बत की सौगाते
उसके सिवा मन तुझ को काया में नही प्रवेश
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |

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नादान दील

ये दील अक्सर नादान हरकतें करता है
अचानक ही धड़कना भूल जाया करता है
याद नही रखता अब कुछ और तेरे सिवा
हमारा होकर हमसे बेईमानी करता है |

आयो होली को त्योहार

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आयो होली को त्योहार 
  बिखरी फागुन की बहार 
मनवा झूमे हमार 
चढ़ता मस्ती का खुमार 
ढोल मंजीरे ढ़म ढ़म 
पैंजनियों की छम छम 
पाव खुदई लेत थिरकन 
नब्ज़ नब्ज़ बढ़े धड़कन 
होली होय हर आँगना मा शोर 
उमड़ा जोश से चारों और 
सात रंगो की बौछार 
अंबर सज गयो अबीर गुलाल 
मदहोस नाचत फाग
म्हारा जिया लगायो आग 
अब के  हमका भी खेलन की होरी 
सैय्या जी से करें की जोराज़ोरी
छिपयके उका रंग मा है रंगाना 
लागत के ये होये की अब ना 
के हम आ गये पिहड़ 
ढोलना रह गयो ससुराल 

 ye niche wali panktiyan mirabai ki rachana hai.

श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया
ऐसी रंग दे के रंग नाही छूटे
धोबिया धोए ये चाहे सारी उमरिया
लाल  रंगाउँ मैं,हरी  रंगाउँ मैं
अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया
बिना रंगाये मैं तो घर नही जाउंगी
बीत ही जाए चाहे ये सारी उमरिया |
                              –मीराबाई