किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ

देखा नज़र भर के तुझे जमाना हुआ
हमारी रुसवाईयों का सबब पुराना हुआ |
हम कब के भुला चुके तीर-ए-नश्तर
नफ़रत-ओ-गुबार दिल से रवाना हुआ |
दुनिया की दौड़ में हो गया शामिल
इंसान खुद की शख्सियत से बेगाना हुआ |
वो तो यूही किसीने जिक्र किया तुम्हारा
छुपाए राज़-ए-इश्क़ तब बताना हुआ |
मुश्किल गलियों से तेरी दहलीज़ तक पहुँचे
दीदार-ए-आफताब नाहो साजिशन सताना हुआ |
रस्मो की जंजीरे तोड़ के निकले जो
राह-ए-वफ़ा तय उनका गुजर जाना हुआ |
यादों और ख्वाबो में मिलने आओगे कभी
फ़िज़ूल ही झिलमिल अरमानो को बहलना हुआ |
सच्चाई को गले लगाना सिख ले “महक”
किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ |

 

 

 

 

 

 

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रब्बा दीदार करा दे

रब्बा दीदार करा दे

रब्बा ये मुझे क्या हुआ है
शायद इश्क़ का बुखार चढ़ा है |

रब्बा मैं सूद बुद खो बैठी
अक्सर मैं बेहोश हूँ रहती |

रब्बा क्यूँ मुझे नींद ना आए
किसकी याद है,जो मुझे सताए |

रब्बा क्यूँ मन उलझ गया है
सबने हमे दीवानी कहा है |

रब्बा कौन है वो काफ़िर बता दे
मिलने जिससे दिल भी रज़ा है |

रब्बा जो मर्ज़ मुझे दिया है
उसके दिल को वही सज़ा दे |

रब्बा अब तो दीदार करा दे
दर्द दिया है , तूही वा दे |

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