सितारे हज़ारों नक़ाब बदलते है

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तुम्हे देख  हमनशी कदम खुद  खुद चलते है
बड़ी मुश्किल से जज़्बादिल हमसे संभलते है |

मिलने तुझ से सातो समंदर भी पार कर जाएँगे
महफूज़ रखेंगे तेरे साए हमे ये सोच  निकलते है |

अंधेरों का ख़ौफ़ नही रहा जिगरजान को हमारी
मोहोब्बत के गवाहचिराग रौशन होके जलते है |

महबूबआफताबजहन के राज़ –ख़यालात यहाँ
वो भी महजबीदिलकशी से मुलाकात हो मचलते है |

फलकआईने से निगाहे निसार  नही होती गुलशन आरा
आपकी आरज़ू में झिलमिल सितारे हज़ारों नक़ाब बदलते है. |

बादल मितवा

राह देखे मन प्रतिपल हर क्षण
ढूँढे तुझे मेरा बिखरा कन कन

नही सुने जाते जमाने के ताने
उस पर  आने के तेरे लाख बहाने

आँखें है बंजर ,कैसे नीर बहाए
सुलगती किरने आकर तनमन जलाए

तुझसे मिलने करूँ सागर का मंथन
धरा हूँ , मुझे है उड़ने का बंधन

ब्रम्‍हांड में पूरे तेरा है विस्तार
मुक्त अकेला ही करता है विहार

सुन रहे हो क्रंदन मत सता रे
कुछ लम्हो की साँसे अब तो आरे

मोहोब्बत का वास्ता तुझे धड़कन पुकारे
बादल मितवा प्यार की बूंदे बरसा रे.

ऐसी हर सहर कीजिए

ऐसी हर सहर कीजिए 

नींद खुले देखूं तुम्हे ऐसी हर सहर कीजिए 
दिल में छुपाए कुछ राज़ हमे खबर कीजिए | 

पैगाममोहोब्बत भेजा है खत में नाज़निन
बुल हो  गर तोहफाइश्क़ हमसे नज़र कीजिए | 

खुशियाँ बाटने यहा चले आएँगे अनजान भी
किसी के गम में शरीक अपना भी जिगर कीजिए | 

आसान राहों से जो हासिल वो भी कोई मंज़िल हुई
खुद को बुलंद करने तय  मुश्किल सफ़र कीजिए | 

दुश्मनजहाँ के तोड़ रहे है मंदिर मज़्ज़िद
अपने गुनाहो की माफिएअर्ज़  अब किधर कीजिए | 

लहू के रिश्तों से भी मिले अब फरेब – खंजर
परायों से अपनापन नसीब वही बसर  कीजिए | 

ज़मीन समेट्ले बूँदो से वो बादल है प्यासा
आसमान झुके पाने जिसे  प्यार इस कदर कीजिए | 

गुलाब से सजाए लम्हे भी मुरझाएंगे कभी
यादों में उनकी “महकरहे ऐसा असर कीजिए |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कौन हो नूरे-जिगर

कौन हो नूरेजिगर कोई मोह्पाश हो
हकते दिल में खिला प्यार पलाश हो |

खीची चली आती हूँ उसी मकाम पर
मुश्किल से मिलती वो बूँद आस हो |

शाहेसमंदर कब का रीता हो चुका
बुझती ही नही कभी अजीब प्यास हो |

तुमसे दूर जाउँ ये ख़याल सितम ढाए
जिस में जकड़ना चाहूं एसे बन्द्पाश हो |

जमाने से छुपाना और जताना भी है
नवाजिश करूँ सब से हसीन राज हो |

परदा उठाओ अब,के बेसब्र दिल हुआ
या पलकों में सजता बस ख्वाब हो. |

आयो होली को त्योहार

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आयो होली को त्योहार 
  बिखरी फागुन की बहार 
मनवा झूमे हमार 
चढ़ता मस्ती का खुमार 
ढोल मंजीरे ढ़म ढ़म 
पैंजनियों की छम छम 
पाव खुदई लेत थिरकन 
नब्ज़ नब्ज़ बढ़े धड़कन 
होली होय हर आँगना मा शोर 
उमड़ा जोश से चारों और 
सात रंगो की बौछार 
अंबर सज गयो अबीर गुलाल 
मदहोस नाचत फाग
म्हारा जिया लगायो आग 
अब के  हमका भी खेलन की होरी 
सैय्या जी से करें की जोराज़ोरी
छिपयके उका रंग मा है रंगाना 
लागत के ये होये की अब ना 
के हम आ गये पिहड़ 
ढोलना रह गयो ससुराल 

 ye niche wali panktiyan mirabai ki rachana hai.

श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया
ऐसी रंग दे के रंग नाही छूटे
धोबिया धोए ये चाहे सारी उमरिया
लाल  रंगाउँ मैं,हरी  रंगाउँ मैं
अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया
बिना रंगाये मैं तो घर नही जाउंगी
बीत ही जाए चाहे ये सारी उमरिया |
                              –मीराबाई 

सखा पलाश संग तुम्हारे

सखा पलाश संग तुम्हारे

बचपन से रिश्ता है ना
तुमसे मेरा और मुझसे तुम्हारा
नैनिहाल के आँगन में
पनपा ये स्नेह प्यारा
अजीब सी कशिश,मीठा एहसास
साथ तुम्हारा,सबसे न्यारा
झुलसाती  दोपहर ,गरम हवायें
तनमन में जब आग लगाती
मनमोहक पुष्प गुच्छ तुम्हारे
ठंडी छाव पास बुलाती
तुम संग अपने खेल रचाती
तुमसे दिल की कुछ 
कही अनकही बातें बतियाती 
आज फिर वही मौसम लौट आया है
ग्रीष्म का,पलाश के फूल खिलने का
और लौट कर आई हूँ मैं भी
पास तुम्हारे,वही अपनापन पाने
जो तुमसे मुझे मिला पल पल
आई हूँ स्नेह पर तुम्हारे
अपना हक्क जताने
उस वक़्त को वापस बुलाने
जो बिता
सखा पलाश संग तुम्हारे
चलो  आज फिर जी लेते है
रेशम बन्ध पुराने हमारे
भूले तो नही हो मुझे
अपनी पहचान बताई मैने तुम्हे छूकर
तुम भी मुझे अपनाओ सखा
पलाश का फूल मेरी अंजनी में रख कर.

धूप का रेशमी टुकड़ा

धूप का रेशमी टुकड़ा

दिन की पहली प्रहर में
कोई दस्तक सुनाई दी
झरोखे से देखा  छुपकर
वो खड़ा था मेरी दहलीज़ पर
सोने सी चमकती काया
मुखड़े पर अरुनिम तेज
धूप का रेशमी टुकड़ा
सरक सरक के आगे बढ़ रहा था

जैसे अपने लिये कोई जगह तलाश रहा हो
कर रहा था इंतज़ार शायद
किवाडो के खुलने का
अंधेरो को उजागर करने का
निशा को आशा में बदलने का
अपने मृग नयनो से
 कुछ खोजता नज़र आया

छिपा ना पाई खुद को ज़्यादा देर
मुझे देख वो मंद मंद मुस्काया
सुनहरे धुलिका के कन उसके
और ही जगमगा उठे
आने दोगी भीतर मुझे
एक टक देख बतिआया
किस राह से आउ
झरोखे से छन छन कर
या खोल रही हो किवाडो के ताले
एक साथ की कह दूँगा सारे ज़ज्बात
जो नाज़ो से दिल में पले

ले रही थी उसकी बातों का अंदाज़
कितनी सच है,कुछ तो हो आगाज़
हां मोह लिया मेरे मंन को 
जन्मो  के रिश्ते का
कर गया प्रण वो
जागृत हुई नयी अभिलाषा
बन जाउ धूप की छाया
खोल दिये सारे बंधन
खुद को उसकी आगोश में पाया

उसने अपना वादा बखूबी निभाया
ले जाता है मुझे संग अपने
जिस राह भी चलता है
मैं शामल हूँ,वो पीताम्बर
ऐसा ही संसार बसाया
और तब से अब तक
दिल में टिमटिमाती  रहती है सदा
उसकी मोहोब्बत की गुनगुनी रौशनी |

ये हिन्दोस्तान सारा ,ये गुलिस्ताँ हमारा

ये गुलिस्ताँ हमारा

रंगबिरंगी फूलों का चमन सजा हो जैसे
हर धर्म को अपने मन में बसाया है वैसे
विविधता की झाकियों का दर्शन कराता 
अनेकता में एकता का संदेसा पहुचाता
भारतवासी को लगता जान से प्यारा
ये हिन्दोस्तान सारा ,ये गुलिस्ताँ हमारा |

सोने की चिड़िया करती अब भी यहाँ बसेरा
अथांग सागर से बनी ताकत,तीनो किनारा
हिमालय की उँची चोटिया जिसका सहारा
नादिया उसकी गोदी में पलती,बसती,बहती
चमकीला कोहिनूर वो,दुनिया में सबसे न्यारा
ये हिन्दोस्तान सारा , ये गुलिस्ताँ हमारा |

आज़ादी के बाद क्यों फैला ये अंधियारा
किस बात की लढाई, किसने किसको मारा
भूल जाए आपस के मतभेद आज के दिंन से
बनाओ फिर सबको अपना एक बार दिल से 
रौशन करा दो चिरागे,खिल जाए उजियारा
ये हिन्दोस्तान सारा , ये गुलिस्ताँ हमारा |

एसे धीरज खोकर बिगड़े काम ना बन पाए
हिम्मत धाडस मन में बांध ले,समझाए
मिलकर कोशिश करो फिर हरियाली छाए
सत्ता की नही जरूरत,वो बिसरा अमन लाए
उठ जाओ,बढ़ाओ कदम,अब देस ने पुकारा
ये हिन्दोस्तान सारा , ये गुलिस्ताँ हमारा |

ख्वाहिशो के कारवाँ

1.आए है हम भी इस मोड़ पर  
   अपनी महक कुछ छोड़ जाए  
   इन ख्वाहिशो के कारवाँ में  
   कही हमारा भी नाम आए | 

2.हम अकेले ही चल रहे थे
    ज़िंदगी की राहेगुजर
   कारवाँ कब अपना हुआ, जानू
   और कोई आहट भी ऩही |

3.गुज़रते हुए वक़्त के साथ
   बढ गयी है ख्वाहिशे और भी
   गीत ,नज़्म ,ग़ज़लो का कारवाँ
   ज़िंदगी की राहो पे रुके ना कभी |

4.जुड़े तो है इस कारवाँ से
  ये ख्वाहिश बस पूरी हो जाए
  भीड़ में तन्हा  समझू ना खुदको
  दिल में क्यो ये ख़याल आए |

  

आई है बसंत बहार

 

 आई है बसंत बहार

सर्द हवाए सुस्ताने लगी
कोहरा भी धुआँ धुआँ
कनक सी कीरने जाल बुनती
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

हर शाख पत्तियो से सजी
बेल हरियाली लहराने लगी
गुलमोहर का चमन खिला
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

झूलो की लंबी कतार
चहेरे पर हँसी फुहार
सखियो संग नचू मनसे
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

फुलो की महक छाई
समीरा मंद मंद बहे
पिहु की पाती लाए
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

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