शमा जलाकर हम बैठे है

हम सदा ही मुस्कुरा जाते है
आपके हर एक दीदार में |

मोहोब्बत के मोती पिरोए है
आपके हर लफ़्ज-ए- इज़हार में |

इश्क़   के   जाम  छलकते है
आपकी हर मीठि तकरार में |

सहर हमे तन्हा कर गयी है
आपके मिलन की खुमार में |

शमा जलाकर हम बैठे अब है
नयी शाम आने के इंतज़ार में |

एतबार है हमे ज़िंदगी

एतबार है हमे ज़िंदगी

ज़िंदगी  जब से रूबरू हमसे हुई है
ख़यालो के तूफान थमसे गये है अभी |

पहले तो हवा का कोई रुख़ ना था
कश्ती को इक नयी दिशा मिली है अभी |

असीम आसमा में उड़ते हम खो गये थे
कदम खने एक नया क्षितीज मिला है अभी |

पतझड़ का मौसम रुखसत ना होता था
गुलिस्ता में बस बहार है पल पल अभी |

मायूसी को डिब्बी में बंद कर दिया है
मुस्कानो की लड़िया फुटती है सदा अभी |

उत्तार चढ़ाव तो आते जाते ही रहते है
संभलकर चलना सिख लिया है अभी |

मनचाहा मोड़ आएगा,यकीं है खुद पर
सही राह चुनेगी एतबार है हमे ज़िंदगी पर |

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हर कवि की कविता

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  हर कवि की कविता

हर कवि की कविता अनमोल होती है
कोहिनूर से भी ना उसका कोई तोल है |

कविता कवि के हृदय के बोल होते है
कोई खरीद नही सकता,ना उसका दाम,ना कोई मोल है |

कवि के जज़्बात जब पन्नो पर उतरते है
अलंकार और शृंगार से वो सजते है |

 कर जब कविता निखरती है
दुल्हन से ज़्यादा खूबसूरत लगती है |

रसिकगनो से जब उसे प्रतिक्रिया मिलती है
उसकी सुंदरता और भी रती है |

उसे दिल से,अर्थ से,भाव से,श्रव करे
इतनी इल्तजा,अनुरोध वो करती है |

कविता हर कवि की इज़्ज़त होती है
नासमझो के सामने प्रस्तुत,वो लज़्ज़ित होती है |

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खत लिखने की रस्म निभाई है

खत लिखने की रस्म

नयनो में ये घटा,आज फिर घिर आई है
खुशियों की बरसात बिन मौसम लाई है |

डाकिया कितने दिन बाद,दहलीज़ पर आया
दूर परदेस से, सजन का खत सन्देस लाया |

खत जब खोला तो, सारे गुलाब के फूल है
खत सिर्फ़ काग़ज़ नही,मेरे यारा का दिल है |

हर लफ्ज़ से उनका प्यार महकता है
दीदार-ए-इंतज़ार का गम छलकता है |

उनका खत पढ़ने में हम मसरूफ़ हो गये
याद करते वो अक्सर,हम महफूज़ हो गये |

जवाब-ए-तखलूस में हमने काग़ज़ कलम उठाया
कोरे पन्नो पर अपने अश्क का मोती बिछाया |

लिखे है हमने भी ,अपने दिल के सारे ज़ज़्बात
काटे है कैसे दिन और वो अकेली सुनी रात |

कभी ना कहना फिर, के हम हरजाई है
ये खत लिखने की रस्म,हमने भी निभाई है |

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आज जाने की ज़िद्द ना करो

आज जाने की ज़िद्द ना करो

लगता है जैसे अरसो पुरानी बात है
गमो के साये सदा हमारे साथ है |

तमस की वो बेबसी,और वो तन्हाई
तरस गया मन सुनने,स्वरो की शहनाई |

महलो में रह कर भी, दामन खाली थे
दिपो की माला थी,पर रास्ते बंद थे |

तुम्हे ढूँढने तो , आसमान भी झुक गये
जहा छोड़ी थी राह , हम वही रुक गये |

आज मेरे सरताज , जो तुम आए हो
प्यार के मधुबन , अपने साथ लाए हो |

सोला शृंगार किये , मेरे मंन की बात हरो
प्रियतम,आज जाने की जिद्द ना करो |

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वो तुम ही तो हो

वो तुम ही तो हो

रहता है जो इन झील सी निगाओं में
बन कर ख्वाब मेरे,वो तुम ही तो हो |

नाम लेती हूँ जिसका मेरी सांसो में
ज़िंदा हूँ मैं जिस कारण,वो तुम ही तो हो |

सुनना चाहूँ मैं हर पल अपने कनखियो से
जो मधुर मीठि वाणी,वो तुम ही तो हो |

जो दौड़ता है मेरी नस नस में लाल रंग
पहुचता है दिल तक मेरे,वो तुम ही तो हो |

किसी भी मोड़ पर,ज़िंदगी की राहों में
जो शक्स मिलता है मुझे,वो तुम ही तो हो |

जो बहता है बनके गीत मेरी अधरो पर
वो नज़्म खालिस,वो तुम ही तो हो |

जो चलता है हर वक़्त साथ साथ मेरे
वो अपनासा साया , वो तुम ही तो हो |

पहना है जिस्म पर मेरी जो शृंगार
वो खूबसूरत गहना,वो तुम ही तो हो |

जिस अज़ीज़ के बिना मैं हूँ अधूरी अधूरी
मुझे सपूर्ण करनेवाले,वो तुम ही तो हो |

जिसे माँगा है हमने खुदा से इबादत में
वो दुआ हमारी,वो तुम ही तो हो |

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