अमलतास के पुष्पित झूमर

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अमलतास के पुष्पित झूमर

ग्रीष्म ऋतु की खनकी पायल
गरम हवायें तनमन  घायल
तपती धरा,झुलसाती हर प्रहर
शाम सुहानी  या मीठी सहर
ज्वाला सी धग धगती दोपहर
सृष्टि पर जैसे टूटा कहर
राह पर मिल जाते हो तुम
लगते हो  सब से मनोहर
पीले सोनम से रंग सजे
अमलतास के पुष्पित झूमर
हरे पन्नो को त्याग  र 
ओढते हो ये लिबास
थकि आँखों को थोडासा हो
खुशनुमा सा हल्का एहसास
काया को नही मोहक सुगंध
जोड़े हो दिल से स्नेह बंध
खुद जले और बने दूसरे की छाया
वही बनता है तुमसा कुंदन
पास आकर तुम्हारे पग जाते ठहर
तुमसे सीखा है जीवन में
बनाना सयमि शीतल चंदन.

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सखा पलाश संग तुम्हारे

सखा पलाश संग तुम्हारे

बचपन से रिश्ता है ना
तुमसे मेरा और मुझसे तुम्हारा
नैनिहाल के आँगन में
पनपा ये स्नेह प्यारा
अजीब सी कशिश,मीठा एहसास
साथ तुम्हारा,सबसे न्यारा
झुलसाती  दोपहर ,गरम हवायें
तनमन में जब आग लगाती
मनमोहक पुष्प गुच्छ तुम्हारे
ठंडी छाव पास बुलाती
तुम संग अपने खेल रचाती
तुमसे दिल की कुछ 
कही अनकही बातें बतियाती 
आज फिर वही मौसम लौट आया है
ग्रीष्म का,पलाश के फूल खिलने का
और लौट कर आई हूँ मैं भी
पास तुम्हारे,वही अपनापन पाने
जो तुमसे मुझे मिला पल पल
आई हूँ स्नेह पर तुम्हारे
अपना हक्क जताने
उस वक़्त को वापस बुलाने
जो बिता
सखा पलाश संग तुम्हारे
चलो  आज फिर जी लेते है
रेशम बन्ध पुराने हमारे
भूले तो नही हो मुझे
अपनी पहचान बताई मैने तुम्हे छूकर
तुम भी मुझे अपनाओ सखा
पलाश का फूल मेरी अंजनी में रख कर.