तुम्हारे लिए

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वादा नही कर रही हूँ कोई तुमसे
क्यूंकी वादों की उमर बड़ी छोटी होती है
टूटने की खनक भी सुनाई नही देती
सारे सपने भी संग ले जाती है
चाहत का इरादा बाँध लाई हूँ
दिल में तुम्हारे लिए
ईरादों की डोर बड़ी पक्की होती है |

कसम नही लूँगी कोई तुमसे ना ही दूँगी
क्यूंकी इश्क़ तो घुल गया फ़िज़ा में
कितने समय तक निभा पाउँगी
कोई हिसाब नही दे सकती
हर कदम साथ रखेंगे इस ज़मीन पर
ये रस्म निभाउँगी तुम्हारे लिए
रस्मो से रिश्ते का एहसास होता है |

कीमती तोहफे नही ला पाई कभी
क्यूंकी किम्मत से दिल नही खरीदे जाते
मुरादें गर वक़्त पर पूरी ना हो
दरमियाँ के फ़ासाले फिर भर नही पाते
एक गुलाब देने की हैसियत रखती हूँ
महक जिसकी सिर्फ़ तुम्हारे लिए
जो यादों में बस कर सदा पास रहती है |

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दीवानगी

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दीवानगी हा दीवानगी ही कह सकते है हम इसे | जो एहसास मन में खुश्बू सी खुशी का
आभास कराए ,उसके पीछे हम दीवाने से ही तो भागे भागे दौड़ते है | 

आज की सुबह भी हर सुबह की तरह ही तो थी | जल्दी उठना ,तैयार होना ,काम ख़तम ना होने पर
चिड़चिड़ापन , सभी को भागने की जल्दी होती है घर में | हम अकेले तो नही , कोई ज़ोर से टीवी 
लगाए समाचार सुनता है , कोई और रेडियो पर गाने  लगाता है | सब क अपने शौक , ज़रा शांति नही 
हमे चाय के चुस्कियों संग कुरकुरी सी लोकल म्यूज पेपर पढ़ने का शौक है | मगर एक एक पन्ना
सब के अलग अलग हाथों में होता है | 

आज हमने भी तय कर लिया, किसी से सुबह सुबह  पेपर के लिए हाथा पाई नही करेंगे 
आख़िर बुरे तो हमही बनते है सब की नज़र में | चाय का प्याला लिए चले गए घर के पीछेवाले
आँगन | शायद हमारे आने से पहले वरुण राज का आगमन हुआ होगा | सब तरफ पानी | सोचा
वापस लौट जाउ अंदर | नही दीवार के कोने से कोई तो झाका था | वहम होगा ,नही नही ,हवा 
के झूले पर झूलती नन्ही सी गुलाबी  कली | जैसे बुला रही हो हमे , आओना ,देखो मुझे |

मन को क्या है ,जहा कोई उसे आमंत्रण मिला जाने की जिद्द शुरू | कभी कभी पाओं से
पहले पहुँच जाता है उस जगह, अपनी अलग कल्पानो समेत | पैर कब पानी में उतरे,साफ़ धुलि 
सलवार औरचूनरी भी कीचड़ में भीगी उसको परवाह कहा | मन और पाव के साथ हम भी वहा 
पहुँच गए | हमे बुलानेवाली और जिसके पीछे दीवाने हो  हम आए वो गुलबो एक ही नही थी | 
उसके जैसी और तीन खूबसूरत सी अपनी अपनी शाखाओ पर झूलती | मोतीयों से
दव बिंदु से सजी कलियाँ  डौल रही थी |

कुछ मोती हमारी भी हथेली पर गिरा दो | ले लो जीतने चाहे मोती लेलो , तुम जैसे दीवानो
के लिए ही तो है ये सुंदर सी अमानत , जो खुद ही अपनी दीवानगियों को भुलाए बैठे है |
रोज सुबह की जल्द बाज़ी में कहा वक़्त निका पाती हूँ | मगर अब याद से आया करूँगी ,
हमे दीवाना बना देने वाली तुम सी दीवानो से मिलने |

किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ

देखा नज़र भर के तुझे जमाना हुआ
हमारी रुसवाईयों का सबब पुराना हुआ |
हम कब के भुला चुके तीर-ए-नश्तर
नफ़रत-ओ-गुबार दिल से रवाना हुआ |
दुनिया की दौड़ में हो गया शामिल
इंसान खुद की शख्सियत से बेगाना हुआ |
वो तो यूही किसीने जिक्र किया तुम्हारा
छुपाए राज़-ए-इश्क़ तब बताना हुआ |
मुश्किल गलियों से तेरी दहलीज़ तक पहुँचे
दीदार-ए-आफताब नाहो साजिशन सताना हुआ |
रस्मो की जंजीरे तोड़ के निकले जो
राह-ए-वफ़ा तय उनका गुजर जाना हुआ |
यादों और ख्वाबो में मिलने आओगे कभी
फ़िज़ूल ही झिलमिल अरमानो को बहलना हुआ |
सच्चाई को गले लगाना सिख ले “महक”
किताबी सुर्ख गुलाब सा तेरा अफ़साना हुआ |

 

 

 

 

 

 

ऐसी हर सहर कीजिए

ऐसी हर सहर कीजिए 

नींद खुले देखूं तुम्हे ऐसी हर सहर कीजिए 
दिल में छुपाए कुछ राज़ हमे खबर कीजिए | 

पैगाममोहोब्बत भेजा है खत में नाज़निन
बुल हो  गर तोहफाइश्क़ हमसे नज़र कीजिए | 

खुशियाँ बाटने यहा चले आएँगे अनजान भी
किसी के गम में शरीक अपना भी जिगर कीजिए | 

आसान राहों से जो हासिल वो भी कोई मंज़िल हुई
खुद को बुलंद करने तय  मुश्किल सफ़र कीजिए | 

दुश्मनजहाँ के तोड़ रहे है मंदिर मज़्ज़िद
अपने गुनाहो की माफिएअर्ज़  अब किधर कीजिए | 

लहू के रिश्तों से भी मिले अब फरेब – खंजर
परायों से अपनापन नसीब वही बसर  कीजिए | 

ज़मीन समेट्ले बूँदो से वो बादल है प्यासा
आसमान झुके पाने जिसे  प्यार इस कदर कीजिए | 

गुलाब से सजाए लम्हे भी मुरझाएंगे कभी
यादों में उनकी “महकरहे ऐसा असर कीजिए |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मुस्कुराहट के गुलाब

मुस्कुराहट के गुलाब

मुस्कुराहटसे सजे जो लब , नूर-ए-शबाब खिले है
एक मुस्कुराहट में हमारी , हज़ारो गुलाब मिले है |

हमारी मुस्कुराहटसे सबको , नशे चढ जाते है
कोई होश में आने से पहले, हम फिर मुस्करा लेते है |

मुस्कुराहट को एक बार तू चख ले जाहिल
जहर-ए-जाम भी ये अमृत बना देते है |

दीदार

दीदार

खुश है मेरी बन्नो,आज मधुचंद्र की रात
सज   कर बैठी है
नही करती किसीसे बात

कुछ भी कहो ,गुलाब सी शरमाए 
पलकों को झुकाए,नयनो से मुस्कुराए

शायद मेरी बन्नो,थोड़ी सी इतराए
पवन के छूअन से भी,थोड़ी सी सहराए 

मुखमंडल पर उसकी,चँदनी का तेज
रंगबिरंगी फूलों से महेकती उसकी सेज

ओढ़ के घूँघट हया का
अपने साजन का करती इंतज़ार

हम भी अब चले यहा से
के बन्ना आया है करने
दुल्हने चाँद का दीदार.

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