उमस भरी दोपहरी में

उमस भरी दोपहरी में
गर्मी की चादर ओढ़े धूप टहल रही थी
वो बादल का टुकड़ा आया
झाक के देखा उसने, आँखों के सूखे मोती
दौड़ा भागा , कुछ आवाज़ लगाई
लू से भारी हवा ठंडक बन लहराई
छाव का शामियाना धरा पर सज़ा
हज़ारों बादलों का जमघट जो लगा
टापुर टापुर बूंदे बड़ी बड़ी झूमको सी
राह पर गिरती , माटी से मिलती
खिड़की खुलने से पहले ही
नयनो के रास्ते मन बाहर था
आवारा बरसातो में भीगता
धूल गया पूरा के पूरा
चमकता नयी कोरी स्लेट सा
नयी हरियाली के उगम में
खुद को समेटता……….

सबल,सजल,सरल

सबल,सजल,सरल,सढल,सुगंधा,स्वस्तिका
बेड़ियाँ को तोड़ कदमो ने ढूंढी है नयी दिशा |

ममतामयी,कोमल हृदय,कनखर भी मैं नारी
वक़्त पड़े जब रक्षा करने बनू तलवार दो धारी |

बहेती रहूंगी हरियाली बिछाती पाने अपना लक्ष
अर्जित करूँ  इतनी आज़ादी कह सकु अपना पक्ष |

हर जीवन फलता फूलता जिस पे मैं हूँ वो शाख
सुलगती चिंगारी हूँ चाहूँ बुरी रस्मे हो जल के राख |