चाहत है एक दिन अमीर बनू

चाहत है एक दिन अमीर बनू
सौ गुन वाला कड़वा नीम बनू |

ज़िंदगी का गहरा भंवर देखा
मोह से अनजान फकीर बनू |

दर्द बहुत दिए अपनो को
मरहम लगाता हकीम बनू |

झूठे आसुओं से लुटा जहाँ
मन को संभाले वो नीर बनू |

कर्ज़ कितना चढ़ा मिट्टी का
मर के भी अमर शहीद बनू |

भंवरों सी फूलों में छुपी ‘महक’
कंवल से खिला झील बनू |

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कभी तो ऐसा हो

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कभी तो ऐसा हो
नींद पलकों में सिमट जाते ही
ख्वाबों में तुम आ जाओ
हम कुछ कहने से पहले ही
मोहोब्बत की शमा जलाओ

कभी तो ऐसा हो
शाम अपने सिंगार खड़ी
टहल रही हो छत पे
हम आह्ट पहचाने तब तक
तुम देहलीज़ पार भीतर आओ

कभी तो ऐसा हो
खनके कंगन ,छुम छुम भागती पायल
जल्दी से काम निबटाये
एक दिन छुट्टी तुम भी लेलो
कोई रंगीन शरारत सिखलाओ ….

तुम हमे यू ना भुला पाओगे

सुना है कल तुम चले जाओगे
ना जाने फिर कब लौट आओगे
जब भी चलेंगी ये मस्त हवाए
हमे तुम याद बहुत आओगे

अश्को को हमने छिपा दिया है
जुदाई पर भी तुम मुस्कुराओगे
एक ही गहरा सदमा काफ़ी है
हमे तुम और कितना सताओगे

वादा अब ये हमारा भी रहा
हम भी तेरे साथ ही रहेंगे
जिस अंजुमन तुम कदम रखोगे 
वहा हम फूल बनकर खिलेंगे

जिस राह भी तुम जाओगे
सब हमे ही तेरी मंज़िल कहेंगे
तेरे दिल को अपना घर बनाया
तुम हमे यू ना भुला पाओगे

नभ आए हमारे द्वार

पगले से मन को कौन समझाए
नील गगन में उँचा उड़ जाए 
हमे  छोड़ अकेला विहार करता
शायद तब थोड़ा सहमता डरता
वापसी की मन को राह दिखलाने
नभ आज  आए हमारे द्वार |

कह कर भी वो ना सुने किसी की
हरपल विचारधारा रखे  खुद की
कितना भी उसे जकड़ना चाहूं
मगर वो भागता ,यूही घूमता
वापसी की मन को राह दिखलाने 
नभ आज आए हमारे द्वार |

नही समझता वो जग की रीत
मिलकर रहना  यही है प्रीत
अकेला वो खुद में ही रमता
गगन की फाहो में छिप जाता
वापसी की मन को राह दिखलाने 
नभ आज आए हमारे द्वार |

hamari khud ki ek marathi kavita ” nabh aaj dari ale” ka anuwad karne ki koshish ki hai,phew,bahut mushkil tha ek bhasha se dusri bhasha mein arth sahit anuwad karna:)

रघुकुल रीति सदा चली आई

बचपन के वो दिन थे कितने सुहाने
कुछ भी कीमत दूं वापस कभी ना आने
कितनी अजब गजब थी वो छोटी सी दुनिया
हक़ीक़त में जहा उड़कर आती परीयाँ
देवगन सारे अच्छे ,बुरे थे सारे दानव
बर्फ की होती राजकुमारी,साथ बूटे मानव
सात समंदर पार से राजकुमार आता
सफेद घोड़े पर बैठ राजकुमारी ले जाता

शाम को सारे बच्चे कहते नानी –
राजारानी से शुरू और उन्ही पे ख़तम कहानी
दीप जलते ही वो दीपम करोती सुनाती
कहानी के साथ कुछ अच्छी बाते सिखाती

बुरा कभी ना सोच किसिका,सदा बनो नेक
राम रहिम येशू नानक सारे ये है एक
जो भी खुद के पास है बाट कर खाना
कभी ख्वाब में भी किसी का दिल नही दुखाना

ये सारे अच्छे बोल नानी बार बार दोहराई
एक बात वो हमे गा बाँधकर समझाई
राम कहत रघुकुल रीति सदा चली आई
चाहे प्राण जाए पर वचन ना जाई

मयूर पंख मैं लाई हूँ

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कैसे सुना तुम्हे हालदिल
मैं ज़रा सी घबराई हूँ
तुम जो खफा हो अचानक
मैं ज़रा सी कतराई हूँ |
जज़्बात मेरे मचल रहे है
कैसे बयाँ करूँ मैं इनको
तुम्हे जो मैं भेज रही हूँ
कैसे सज़ा उस खत को |
कुछ अपने लहू से लिख दूं
या फिर अश्को के मोती रख दूं
मन इतना उलझ गया है
या फिर कोरी पाती भेज दूं |

सूरज की किरानो से लिख दूं
या चाँद की रौशनी छिड़क दूं
मन को कोई खबर नही
या तारों की चुन्नर जोड़ दूं |

अपने प्यार की नीव है गहरी
जैसे कोहरे में धूप सुनहरी
इश्क़ की बदरी को बरसाने
अब मयूर पंख मैं लाई हूँ |

कुछ जज़्बात

कुछ जज़्बात , कुछ भावनाये ,

क्यूँ आती है उमड़ कर  

हौलेसे बिन बुलाए मेहमान की तरह रूक जाती है

 

कभी कुछ कहती है , कभी यूही खामोशी से रहती है

 

 

एक ल़हेर सी उछल जाती है ,कभी तरंग बन थिरकती है

 

 कभी दिल के कोने में छुपी हुई पाती हूँ उन्हे

 कभी खुल खुलकर बरसती है बेईमान हो हमसे

 सब के सामने आकर बहती है ,हमे भी भिगो देती है

 कई बार रुसवा कर देती है , कभी हथेली पर

छोड़ जाती है खुशी के दो मोती
हर रूप में उनके , हमे बहा कर ले जाती है……….

 

 

 

आशाओं की बूंदे

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दिल की राह पर चलते हुए
अक्सर कुछ अनकहे मोड़ आते है
राह वही पर मंज़िले बदल जाती है
कुछ पल अकेले ,कुछ पल तन्हा भी सुकून देते है
अगले मोड़ कोई और जुड़ जाता है , चुपके से
पता भी नही चलता , कब मंज़िल आती है
हर बरसे बादल के साथ क्या सब धूल जाता है?
यादों की लकीरें भी मिट जाती है?
शायद नही , शायद हाकही बंद ज़रूर होती है
राह आसान तो नही कोई , ठोकर किसी वक़्त लगती है
मुश्किल ना हो तो खुशियों की एहमियात नही रहती
सब भीग जाने के बाद , जो आशाओं की बूंदे गिरती है
किस्म उन्हे उमीद कहती है 
यकीन था हमे , वो टुकड़े ख्वाबों को फिर सिलती है
गिरने दो उन बूँदों को खुद परतब महसूस करना
रौशनसोनम  दिल से फिर जुड़ती है…..

मोहोब्बत की वादियों में

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मोहोब्बत की वादियों में
तेरे साथ चलते हुए सफ़र आसान है
सोचती हूँ हम दोनो दिल से जुड़े 
अलग पहचान कहा हमारी
ना जाने अचानक तुम
कहा गुम होते हो
हमारे साथ होकर भी तन्हाई
खोजते हो ……..
ऐसा क्यों .? हमे बताओगे
इसका जवाब दे पाओगे ….

भीगे स्पर्श का एहसास

सागर किनारे तक आकर आलिंगन देती ल़हेरे
आते वक़्त भर भरके तुम्हारी यादे समेट लाती है

मेरे मन में उठते हुए  हज़ारों ख़याली तूफ़ानो को
बहुत दूर  कही तो अपने साथ वापस ले जाती है

गीली रेत पर तुम्हारा नाम प्यार से लिखते समय
तुम्हारे भीगे से स्पर्श का एहसास  करा देती है 

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