बरसाती ख़याल कुछ यू भी

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मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |

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ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

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मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |

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सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
बूंदो  के झुमके  पहन भीग रही छत पे |

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बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’  के  नैना |

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ख्वाब

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ख्वाब

अँखियों की  पलकों में समाए ये रहते
मन में छिपी बातों को हमसे ये कहते
कुछ स्याह कुछ इंद्रधनु से रंगीन ये ख्वाब |

नींद में कितने बन जाते ये अपने से
खुल जाए जो चक्षु  हो गये पराए वे
कुछ पाकर कुछ हाथों से ओझल ये ख्वाब |

ख्वाबों में जीना अक्सर ज़रूरी होता है
समझ कर उन्हे पाना मुश्किल होता है
दिखाते है अरमानो को मंज़िल ये ख्वाब |

ख्वाबो पर अपना हर पल निर्भर ना हो
अक्स छोड़ परछाई दिखाए वो दर्पण ना हो
कुछ खिलते कुछ खुद से बोझिल ये ख्वाब |

सोलहवा सावन

सोलहवा सावन

रिमझिम खनकती बूँदे , जब आंगन में आती है
उन भीगे लम्हो को , संग अपने लाती है |

बचपन की लांघ दहलीज़ , फूलों में कदम रखा था
चाँद को देखकर , खुद ही शरमाना सीखा था |

सखियों से अकसर ,दिल के राज़ छुपाते
कभी किसी पल में ,वींनकारण ही इतराते |

बारिश में यूही , घंटो भीगते चले जाते
सखियो जैसे हम भी , इंद्रधनु को पाना चाहते |

सावन के वो झूले , हम आज भी नही भूले
उपर उपर जाता मन , चाहता आसमान छूले |

भीग के जब तनमन , गीला गीला होता था
पिहु मिलन का सपना, नयनो में खिलता था |

आज भी बारिश की बूँदे, हमे जब छू लेती है
सोलहवा सावन आने का.पैगाम थमा देती है |

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