जुगनू बन कर जागता है कोई

काली घटाओं के पर्दे से झाकता है कोई 
अध खुले उन नयनो से ताकता  है कोई |

हम तो अनजान बन गुजर जाते मोड़ से
बावरा ये मन क्यों काफिर भागता है वही |
दर्पण से कुछ पूछू वो जवाब नही देता
मालूम नही चल रही क्या रास्ता है सही |
  

 

 

 

 

 

गवाह –दिल कहते मिली उनको मंज़िल
उस अजनबी रूह से अपना वास्ता है कोई |


 

 

 

अपनो के जज़्बात जहाँ लोग समझे नही
हमारे लिए जुगनू बन कर जागता है कोई |

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