मोहोब्बतें

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मोहोब्बतें

आँखों से आँखों का फलसफा कहती
खामोशियों में भी मदहोश सी बहती
मोहोब्बतें बन अफ़साना हमारे दिल में रहती
क्यों बदलासा लगता है फ़िज़ायों का वही मौसम
क्यों अपनासा महसूस होता है पराया मन
खुद से भी ज़्यादा उनकी तासीर होती
अदा में शर्माने की तालीम होती
गालों पे लट का गहना सजता
दीवाना दिल पल पल बहका सा मिलता
कैसा जुनून कैसा नशा  जो उतरता नही
तन एक जहाँ में मन बादलों में कही
रब्बा कोई दवा खास बनाई तूने गर
मत देना हमे कभी माँगे भी तो
रहना चाहूं यूही बेहोश पूरे सफ़र |