दिल के जज़्बात

   

 हाथों में उठाए काग़ज़ और क़लम
लिख देते है दिल के जज़्बातों को
खुद के  ही अल्फ़ाज़ कभी पक्के ,कभी कच्चे से लगते है |

कल्पनाओ को मन के नया रूप मिलता
जी लेते है अपने उन सिमटे ख्वाबों को
भावनाओ में बहेते तरंग कभी झूठे ,कभी सच्चे से लगते है |

अक्सर निकलती वो मोहोब्बत की बातें
कभी दोहराते मजबूत ,बुलंद इरादों को
हम चाहे जो भी लफ्ज़ पिरोए,मन  को अच्छे ही लगते है |

बहुत अरमानो से सजाते और सवारते है
बेंइन्तहा चाहते है अपनी कविताओं को
जैसे हर मा को सबमें खूबसूरत अपने बच्चे ही लगते है |

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और कुछ भी नही

और कुछ भी नही

दर्पण में अपनी छवि देख रहे थे
देखा तेरा अक्स,और कुछ भी नही  |

जमाने के फसाने सुनने चाहे हमने
सुनी तेरी धड़कन,और कुछ भी नही |

खुदा से  गुनाहो की माफी माँगनी चाही
माँगा सिर्फ़ तुझे,और कुछ भी नही |

मुशायरे मे बैठे अपनी नज़्म भूल गये
याद रहे  बस तुम,और कुछ भी नही |

काग़ज़ कलम लेकर ग़ज़ल लिखनी चाही
एक  तेरा  नाम लिखा ,और कुछ भी नही |