मेहमान

मिहीका आज बहुत खुश थी | उसे लग रहा था मानो हर पल थम थम कर चल रहा हो.

अगर वक़्त के पंख होते तो कितना अच्छा होता,
कल सूब तक का इंतज़ार इतना लंबा  होता | 

सफ़र  की तैय्यारियाँ और ज़रूरत की सारी चीज़े लगभग उसने समेट ली थी | 
बस समीर की कुछ चीज़े बाकी थी , वो ऑफीस से लौटकर करना चाहते थे |
    
   समीरमिहीका उन खुश किस्मत दंपतियों में से है,जो हर पल खुश मिजाज़ होते है,

शायद ही एक दूसरे से ज़्यादा उन्हे और कोई समझता हो.
दोनो मुंबई में एक ही कंपनी में कार्यरत थे.किसि ट्रैनिंग प्रोग्राम के अंतर्गत 

उन्हे छह माह के लिए दिल्ली जाना था | दिल्ली में मिहीका का मायका है.शादि के सात सालों में इतने लंबे अरसे तक वह माता –पिता के सात नही रही थी | कभी जाती भी तो दो या तीन दिन के लिए
 उसे छुट्टी नही होती,कभी बच्चों को छुट्टी नही होती.,हर बार का अलग कारण | मगर
 इस बार बात ही कुछ और थी | कार्यालइन शिक्षा के लिए कंपनी की तरफ से ही जाना था,

बच्चे भी दादादादी के पास ही रहनेवाले थे | 

विचारों की तरंगे उसके मन में बहती ही जा रही थी | इस  बार मा के हाथों बना खाना खाउंगी,
बाबा के सात घूमने जाउंगी,जिद्द करूँगी,अपना बचपन पास से निहारुन्गि,

फिर से जीउंगी मासूम लम्हों को |

   “कहा खोई है आप?”समीर की चुटकी से मिहीका की तन्द्रि टूट गयी | “समीर हम दिल्ली  जाएँगे तो ये करेंगे,वो करेंगे…” अपने सपने मिहीका सुनाती गयी 

और  समीर बस मुस्कुराते रहे |

  सूब जल्दी तैय्यर होकर दोनो ने अपनी विमान यात्रा आरंभ की | दोढाई घंटे का सफ़र,मिहीका को बरसों सा प्रतीत हुआ,उसका
 मन तो कब का अपनी मंज़िल पर पहुच चुका था | 

जब दिल्ली पहुँचे,उसके खुशियों का ठिकाना ना था |
अम्माबाबा से मिलकर दोनो बहुत सुकून महसूस कर रहे थे | मिहीका लगता है भगवान ने हम दोनो की मुराद पूरी की है,समीर और तुम 

छह माह साथ रहोगे,बहुत अच्छा रहेगा,वरना
 इतना बड़ा बंगला खामोश रहता है,

तुम दोनो की चहक से गूँज उठेगाअम्मा कह गयी.|

   “समीर ,तुम दोनो उपरवाले कमरे में रुक जाना,वेहा हम दोनो नही आते जाते,

अब इस उमर में चढ़ना नही होता,फिर आप 
लोगों को भी एकांत मिल जाएगाबाबा बोले.”बाबा,हम लोग तो हमारे मा,बाबूजी 

के साथ छोटे फ्लॅट में रहते है ,
जैसे मेरे लिए वो है,वैसे ही आप लोग,एकांत क्यूँ चाहिए भला”.समीर बोले | इधर मिहीका अपनी अम्मा संग बातों में मशगूल हो गयी |
           जहा समीर और मिहीका को जाना था वह कार्यालय भी घर  से पंद्रह मिनिट की दूरी पर था | 

पहेले पाँच दिन बहुत अच्छे रहे | एक दम जैसे मिहीका ने सोचा था |
दोनो सात मिलकर आते,जाते,शाम को अम्माबाबा के सात घूमते,कभी अकेले ही निकल जाते | खूब  हँसी ,मज़ाक,खाना,गाना | 

मिहीका मानो आसमानो पर चल रही थी |

    आज जब दोनो घर लौटे,देखा समीर कुछ चुप चुप से थे.”क्या बात है ,सब ठीक तक तो है?”

मिहीका समीर को देख बोल पड़ी |
सब  ठीक है मिहीका,मगर हम दोनो कल कंपनी के फ्लॅट में शिफ्ट हो रहें है,

मुझे चाबियाँ मिल गयी है.”समीर स्पष्ट स्वर में बोल गये |

   “क्यूँ?,हम तो यहा कितने खुश है,अम्मा बाबा भी | 
 उपर से फ्लॅट जिस जगह है वहा से डेड घंटा लगता है आने जाने में,

फिर साफ सफाई करों वो अलग | क्या परेशानी है यहा”?मिहीका.

परेशानी कुछ भी नही है मिहीका,अम्मा बाबा के साथ मैं भी खुश हूँ,मगर जितना भी कहो 

ये मेरी ससुराल है,जहा
 मैं ज़्यादा दिन नही रुक सकता | मेहमान तो आकर जाने के लिए होते है,

कब तक बाबा पर बोझ बने,मैं ने बाबा से बात कर ली है,उन्हे
 कोई आपत्ति नही,हा तुम्हे यहा रुकना है,रुक सकती हो.”.समीर बोले | 

मिहीका निस्तब्ध होकर सुन रही थी,विश्वास नही हो रहा था उसे,
यह सब समीर कह रहे है | अंधेरो के साथ कमरे में सन्नाटा भी  गया. |
  

    रात को खाना की मेज पर भी जैसे खामोशिया परोसी गयी थी | 

सब बिना कुछ कहे,एक दूसरे से नज़र मिलाते,चुराते खा रहे थे |
बाबा ,आप ही समझाइये  समीर को,वो यहा से जाने की जिद्द पर है.”

मिहीका की आवाज़ में नमी थी |
मिहीका,मैं समीर के फ़ैसले का आदर करता हूँ,शायद तुम्हे भी करना चाहिए,
कभी मैने भी वही महसूस किया था जो समीर कर रहे है.ससुरा में रहना कितने दिन है,

 ये मैं उन पर छोड़ देता हूँबाबा.
         “क्या ये घर उनका नही है?मेरा मायका भी उनका हुआ,जैसे उनका मायका मेरा ससुराल कम,

मायका ज़्यादा बन गया.”मिहीका

है मिहीका,ये भी घर मेरा ही है,सब अपने है,मगर…..तुम्हारे सवाल का स्पष्टीकरण 

मेरे पास नही है,बस,और कोई बहस नही.”कह समीर रुक गये |

   खाने के बाद,रसोई में जब मा,बेटी काम निबटा रही थी,मिहीका ने पूछा अम्मा,

जब मेरी शादी हुई,तुमने कहा था,अब
 मैं यहा मेहमान हूँ,ससुराल मेरा असली घर हैं | 

मैने  भी उस घर को सात सालों से अपना समझा,
अगर मेरे मैके में समीर मेहमान है,उनके मैके में ,मैं भी मेहमान हुइ.

वो तो सात दिन भी अपने ससुराल नही रहे,मैं सात साल काट आई हूँ |
इस घर की मेहमान,उस घर की भी मेहमान,मेरा असली घर कौनसा है अम्मा:?”

मेरे पास तेरे सवाल का जवाब नही है मिहीका.”अम्मा .

किसके पास है अम्मा इस का जवाब”?मिहीका.
आप देंगे ?

बहुत अरसा हुआ इस घर से कदम निकले
सोचा खुशियों के राह पर हम निकले
मेहमान हो सफ़र के,एक तीर चूभा दिया
अपना,पराया कौन समझाओ,इस से पहले के दम निकले |

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मंदिर होये मूरत,हृदय बसे भगवन

मंदिर होये मूरत,हृदय बसे भगव

ये छोटिसी कहानी हमारी मा काफ़ी बार हम सारे भाई बहनो को दोहराती रहती है|
एक कस्बे में सुखी नामक बहू,अपने पति और साँस के संग रहा करती थी | उनकी
ईश्वर पर अटल श्रद्धा थी | लेकिन सांसजी को प्रभु पर कोई भरोसा ना था | किसी हादसे
वश वो अपना विश्वास प्रभु पर से खो  चुकी थी | हालाकी पतीजी ईश्वर को मानते थे |


    जब भी सुखी बहू ईश्वर का नाम स्मरण करने लगती,सांसजी टोक दिया करती|
गुस्सा हो जाती | सुखी बहू की जीवन में बस एक ही इच्छा थी,के पास के गा जाकर,
हा के हरी नारायण मंदिर के दर्शन करे,जो की काफ़ी जागृत देव स्थान माना जाता |
मगर अपनी नास्तिक साँस से कभी अनुमति नही माँग पाई |


    एक बार पतीजी लंबे अरसे बाहर देश गये | सुखी बहू दिन भर काम करती,प्रभु को 
याद करती,मिलने आने दो की रट सुनाती | सासू मा ने गुस्से में सुखी बहू को बँधवा दिया
 पेड़ से,कस कर रस्सिया बँधी | सुखी को ना वो खाना देती ना पानी | ‘अपने ईश्वर को
बुलाओ मद्दत के लिए ‘ इतना ही कहती | सुखी भी नारायण का जाप करे जा रही थी |


    आख़िर प्रभु को दया आही गयी सुखी पर |उन्होने पति का रूप धरा और पहुँचे,जहा 
सुखी को बाँध रखा था | हालचाल पूछा,क्यों बँधा पूछा?सुखी ने प्रभु मिलन की इच्छा प्रगट की |
पति रूप में जो प्रभु थे बोलेठीक है ,तुम सांसु मा को बिना बताए ही चली जाओ,तुम्हारी जगह
यहा हम रहेंगे,सब संभाल लेंगेतुम जाओ और उस पत्थर की मूरत के दर्शन कर आओ |”


   जैसे ही सुखी चली गयी,प्रभु ने सुखी का रूप धारण किया,खुद बँध गये,पेड़ सेसासू मा 
समझती ,सुखी ही है,रोज ताने कसति  उन पर.|प्रभु बस मिथ्या हंस पड़ते |
    इधर सुखी बहू मूरत के दर्शन कर खुश हुई | पर पत्थर की मूरत में ,उसे भगवान का तेज 
ना दिखाई दिया | कुछ गाववाले जो तीरथ से आए,उन्होने सुखी बहू मंदिर में होने की खबर 
सांसुजी तक पहुँचा दी |

सांसुजीविश्वास ना करे,कहे सुखी तो पेड़ से ही बँधी है |लोग भी जाते, देख कर हैरान हो जाते |

सुखी बहू घर लौटी ,तो दो दो सुखी को देख कर सारे लोग भ्रम पे पड़ गये | दो नो कहती मैं 
असली बहू हूँ | आख़िर हार कर असली सुखी बोली ‘प्रभु अब खेल बस,मैं मंदिर दर्शन तो
कर आई,पर आप मुझे वहा नही मिले,बस आपकी मूरत थी “.और रो पड़ी |


   प्रभु प्रकट हुए बोले ” सुखी बहू,इसलिए तो हमने कहा था,जाओ और उस पत्थर के मूरत के
दर्शन करो,आरे जब हम यहा है,आपके मन में है,वहा कैसे मिलेंगे |”इतना कह चले गये |
प्रभु दर्शन पाकर सारे लोग धन्य हो चुके थे |सासुमा को भी अपनी ग़लती का एहसास हुआ|
सुखी बहू को भी समझ आगया के प्रभु,हर हृदय में बसते है | चाहे वो इंसान का हो या किसी 
और प्राणी मात्र का | दिल से उन्हे याद करो,प्रभु ज़रूर भक्तो की पुकार सुनते है |


   हमारी मा अक्सर कहती है,प्रभु से मिलना हो तो मदिर जाओ ही,मगर किसी की मद्दत करो|
किसीसे दो मीठे लफ्ज़ कहो.किसी और के लिए भी कभी दुआ करो ,किसी की खोई मुस्कान 
लौटाओ,किसीकि तकलीफ़ समझो,प्रभु तुम्हे वही मिल जाएँगे |

कहा किस दिशा में खोजत 
कौन राह तू करेगा भ्रमण
दर्शन की प्यासी अँखियाँ तोरी
कितना खर्च करे वो धन |

लालसा ये जन्मी है अंदर
प्रभु मिलन को तरसात मन
जानत नायी कौनू ठा ठिकाना
इस चिंता मा  झुलस तन |

सारे जगत को भूले बिसरे
कर्म छोड़े,लगी ये अगन
प्रभु के गुण बखान करे 
सदा रखिए खुद को मगन |

एसो ढूँढन से नाही मिलत
प्रभु का होत सुनिश्चित स्थान
मंदिर मा छबि होवे मूरत
हर जीव हृदय बसे भगवन |

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jaise soch wo hi dekhai de

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एकांत जगह,सुंदर वन में,घने हरे पेड़ के नीचे
हर एक पन्ने पर वाल्मीकि,रामायण की महान गाथा लिखते
जब वो राम गाथा अपने शिष्यों को कथन करते
अदृश्य रूप में हनुमान भी उसे श्रवण करने आते
सिताजी को अगवा कर रावण ने रखा था अशोकबन में
जब राम गाथा का,ये चरण चला
सिताजी के गम से,सब का हृदय हिला
जब वर्णन हुआ,जिस वृक्ष के नीचे सिताजी थी बैठी
उस वृक्ष के सारे फूल थे सफेद
हनुमान तुरंत असली रूप में आकर बोलें
वाल्मीकि यहाँ मुझे आपसे है मतभेद
याद है मुझे पक्का,चाहे बीते हो इतने साल
सफेद नही,उस वृक्ष के सारे फूल थे लाल
अपनी अपनी बात पर दोनो अड्डे
सुलझाने ये उलझन रामजी के सामने हो गये खड़े
रामजी बोलें,वो फूल थे सफेद,वाल्मीकि है सही
हनुमान तुम्हे सफेद फूल नज़र आयें लाल
क्योंकि तुम्हारा अंतर मण तब था गुस्से से भरा
मान के गुस्से का लाल रंग तेरी आँखों में था उतरा
हनुमान समझ गये रामजी की बातें
इस छोटे कथन से हम भी आओ कुछ सीखे
जैसी हमारी सोच होती,हुमे वोही देखाई दे
इसलिए अपनी सोच में,लाल गुस्सा नही,श्वेत की शीतलता रखे.