मयूर पंख मैं लाई हूँ

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कैसे सुना तुम्हे हालदिल
मैं ज़रा सी घबराई हूँ
तुम जो खफा हो अचानक
मैं ज़रा सी कतराई हूँ |
जज़्बात मेरे मचल रहे है
कैसे बयाँ करूँ मैं इनको
तुम्हे जो मैं भेज रही हूँ
कैसे सज़ा उस खत को |
कुछ अपने लहू से लिख दूं
या फिर अश्को के मोती रख दूं
मन इतना उलझ गया है
या फिर कोरी पाती भेज दूं |

सूरज की किरानो से लिख दूं
या चाँद की रौशनी छिड़क दूं
मन को कोई खबर नही
या तारों की चुन्नर जोड़ दूं |

अपने प्यार की नीव है गहरी
जैसे कोहरे में धूप सुनहरी
इश्क़ की बदरी को बरसाने
अब मयूर पंख मैं लाई हूँ |

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कविता

कविता ही है मेरा जीवन
कविता ही करता ये मन
कविता ही मेरी रागिनी
कविता ही सखी संगिनी

कविता में ही धुन बनाती
कविता को ही गुनगुनाती
कविता में ही खुद को खोजती
कविता में ही शब्द पिरोती

जब नयन नीर से भर जाए
कविता ही मुझे मदहोश बनाती
मन के खाली चित्रों में नित
 नये रंग वो सजाती

कविता है राज मेरे दिल का
कविता है पुष्प कवल का
भजन से पूजा शुरू करूँ
भगवान के चरण अर्पित करती

कविता को गंगा सी समझती
इसलिए मैं सदा हूँ कहती
महक मैं फ़िज़ा में रहती
पर सदा कविता में हूँ बहती |

आशाओं की बूंदे

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दिल की राह पर चलते हुए
अक्सर कुछ अनकहे मोड़ आते है
राह वही पर मंज़िले बदल जाती है
कुछ पल अकेले ,कुछ पल तन्हा भी सुकून देते है
अगले मोड़ कोई और जुड़ जाता है , चुपके से
पता भी नही चलता , कब मंज़िल आती है
हर बरसे बादल के साथ क्या सब धूल जाता है?
यादों की लकीरें भी मिट जाती है?
शायद नही , शायद हाकही बंद ज़रूर होती है
राह आसान तो नही कोई , ठोकर किसी वक़्त लगती है
मुश्किल ना हो तो खुशियों की एहमियात नही रहती
सब भीग जाने के बाद , जो आशाओं की बूंदे गिरती है
किस्म उन्हे उमीद कहती है 
यकीन था हमे , वो टुकड़े ख्वाबों को फिर सिलती है
गिरने दो उन बूँदों को खुद परतब महसूस करना
रौशनसोनम  दिल से फिर जुड़ती है…..

तुम्हारा हमारा रिश्ता

तुम्हारा हमारा रिश्ता है दूध सा सफेद जैसे
तुम्हारा हमारा रिश्ता है मलमल मलाई वैसे
कभी उबल उबल कर बरतन से बह जाता है
कभी ठंडा होकर घुली शर्करम मिठास पाता है |

मोहोब्बत की वादियों में

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मोहोब्बत की वादियों में
तेरे साथ चलते हुए सफ़र आसान है
सोचती हूँ हम दोनो दिल से जुड़े 
अलग पहचान कहा हमारी
ना जाने अचानक तुम
कहा गुम होते हो
हमारे साथ होकर भी तन्हाई
खोजते हो ……..
ऐसा क्यों .? हमे बताओगे
इसका जवाब दे पाओगे ….

भीगे स्पर्श का एहसास

सागर किनारे तक आकर आलिंगन देती ल़हेरे
आते वक़्त भर भरके तुम्हारी यादे समेट लाती है

मेरे मन में उठते हुए  हज़ारों ख़याली तूफ़ानो को
बहुत दूर  कही तो अपने साथ वापस ले जाती है

गीली रेत पर तुम्हारा नाम प्यार से लिखते समय
तुम्हारे भीगे से स्पर्श का एहसास  करा देती है 

अधूरापन

अधूरा

इच्छायें , आकांक्षायें
क्या सिर्फ़ तुम्हारी ही होती है ?
जो के हमेशा पूरी होनी चाहिए
दिन भर काम करके 
मैं भी थक जाती हूँ
पर तुम्हे उससे कोई सरोकार नही
तुम्हे जो चाहिए तुम छिन लेते हो
कभी प्यार से , कभी हक़्क़ जता कर
और मेरी भावनाओ का क्या ?
जब तुम थक कर  आते हो
बात  भी नही करते
प्यार का स्पर्श बहुत दूर 
मेरे मन की आग काया में जलती है
कामिनी धग धगती है
शायद सुबह तक
बुझ भी जाती होगी
मगर एक अधूरेपन की चिंगारी सुलगा के…….

ख़यालों में

 

ख़यालों में

 

 

 

जब तुम पास नही होते

 

 

या पास होकर भी दूर होते हो

 

 

तेरा ही ख़याल करती हूँ मैं

 

 

पलकों के पर्दे पर तेरा चित्र बनाती

 

 

उन में प्यार के रंग भर देती

 

 

बेहोशी का आलम , मैं तुझे निहारती

 

 

कभी तुम भी आकर देखो

 

 

हमारे ख़यालों में ,

 

 

तेरे लिए क्या सोचती हूँ मैं

 

 

कभी तुम भी मुड़कर देखों ,

 

 

तेरे ख़यालों में डूबी हुई

 

 

हक़ीक़त में कैसी लगती हूँ मैं |

 

 

 

पवन बासूरी

पवन बासूरी

भोर की रंगों से सज़ा गगन
सुनहरी रश्मि का  आगमन
कीलरव से चहेका चमन
अंगड़ाई ले जागा मधुबन
अध खुले अध खिले  सुमन
शरारत भरी थोड़ी चुभन
पंखुड़ियों पर रेशम छूअन
पुलकित रोमांचित करता तनमन
बासूरी पर छेड़ी प्रीत गुंजन
प्यार महकाता नटखट पवन 

खुद से मिलना ज़रूरी होता है

दुनिया की भीड़ में खुद को ढालना  ज़रूरी होता है

 

दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना  ज़रूरी होता है |

 

 

 

दर्दधूप में जिगर जलते हुए हसना ज़रूरी होता है

 

जज़्बातों की बाढ़ बह जाए दिल से तब रोना ज़रूरी होता है |

 

 

 

उमरराहकदम में हमसफ़र होना ज़रूरी होता है

 

यहा सब को कुछ पाने के लिए कुछ खोना ज़रूरी होता है |

 

 

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