सुबह का कोहरा

खोल दो अपनी पंखुड़ियों को 
हौले हौले एक के बाद एक 
फैलाओ अपनी बाहें इतनी 
सारी कायनात भर लो 
आशाओं के ख्वाब सजने दो 
मन को नित नयी सी 
अपने वजूद की धुन रचने दो 
हक़ीकत के पराग कन 
सच बनकर खिलेंगी
सुबह का कोहरा छटते ही
ओस की बूंदे मिलेंगी |

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आई है बसंत बहार

 

 आई है बसंत बहार

सर्द हवाए सुस्ताने लगी
कोहरा भी धुआँ धुआँ
कनक सी कीरने जाल बुनती
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

हर शाख पत्तियो से सजी
बेल हरियाली लहराने लगी
गुलमोहर का चमन खिला
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

झूलो की लंबी कतार
चहेरे पर हँसी फुहार
सखियो संग नचू मनसे
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

फुलो की महक छाई
समीरा मंद मंद बहे
पिहु की पाती लाए
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |