आई है बसंत बहार

 

 आई है बसंत बहार

सर्द हवाए सुस्ताने लगी
कोहरा भी धुआँ धुआँ
कनक सी कीरने जाल बुनती
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

हर शाख पत्तियो से सजी
बेल हरियाली लहराने लगी
गुलमोहर का चमन खिला
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

झूलो की लंबी कतार
चहेरे पर हँसी फुहार
सखियो संग नचू मनसे
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

फुलो की महक छाई
समीरा मंद मंद बहे
पिहु की पाती लाए
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

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आम की बगिया

आम की बगिया

लहराते हरेभरे खेत में
बहती बलखाती नदिया
उसके नज़दीक सजी है
हमारी आम की बगिया

घने घने वृक्षो की काया
शीतल ठंडी उनकी छाया
ग्रीष्म में जब धूप खिले
मीठि बानी कोयल बोले
कच्चे पक्के फिर आम मिले

चढ़ सके वो वृक्ष चढ़ जाए
ना चढ़े वो कंकर से गिराए
रसीले आम सबको ललचाए
ठंडी छाव में सब बैठकर
आमो का आस्वाद उठाए

कही से मुआ माली आता
आम चुराए,शोर मचाता
किसिको वो पकड़ ना पाता
आम लेकर हम भाग जाते

है तो ये बड़ी बात पुरानी
बचपन की एक याद सुहानी
आज भी हर आम को समझू
आम की बगिया की निशानी.

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