चाह कर भी रूक नही सकता

चाह कर भी रूक नही सकता अमर वो वक़्त हूँ
छाया मिले निज संसार मैं धूप खड़ा दरख़्त हूँ
सब कुछ पाकर भी चैन कहा भागती है हसरते
 ज़ीले मन मर्जी  लौट ने वाला लम्हा फक़्त हूँ |

ज़िंदगी का हर कदम

ज़िंदगी का हर कदम तेरे साथ चलते है
हर लम्हा तुझ संग बिताने हम मचलते है
डर है तू सफ़र में कही आगे न निकल जाए
इसलिए जानम तेरी तरक्की से जलते है |

तेरी याद में

तेरी याद में
कितनी करवटें बदली,कितनी सिलवटें बिखरी
नींद से कोसो दूर वो रात भी जागी साथ हमारे
गमजुदाई में तेरी डूबे थे इस कदर क्या कहें
उलफतदिल उलझा रहा और चुन गयी दीवारे
तुझ से मिलना बहुत हो गया मुश्किल हमदम
मुलाकात की ख्वाहिश पूरी करने टूटे लाखों सितारे
अब तलक ताज़ा  है वो आँसू जो निकाला तेरी याद में
तुझ बिन हर सुना लम्हा कट जाता है उसके सहारे |

वक़्त ही बाकी रह गया है

वक़्त ही बाकी रह गया है

अक्सर सुनती आई हूँ,वक़्त की कमी है |
मेरी आँखों में बस, तेरी यादों की नमी है ||

एक वक़्त था जब,हम लम्हा लम्हा जिये थे |
इश्क़ की मधुरा ,तुम्हारे साथ साथ पिये थे ||

सच कहते है सब,के वक़्त रेत का टीला है |
समझ नही पाए खेल,वक़्त ने जो खेला है ||

वक़्त ही तो था , तुम सावन से आए थे |
वक़्त ने ही बताया , तुम बस साये थे ||

वक़्त ने ही हमारे, इश्क़ का बिगुल बजाया |
वक़्त ने ही हमारे , अरमानो को सजाया ||

ढूँढ रही हूँ आज, वो वक़्त कहा खो गया है |
मुझे ख्वाब से जगाया ,और खुद सो गया है ||

यारा इश्क़ के साथ , मेरा सब कुछ चला गया है |
अब तो एक इंतज़ार, और वक़्त ही बाकी रह गया है ||

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