ए ज़िंदगी

ज़िंदगी

सुबह तड़के
ठंड में सिकुडती बाहें
हाथों में दूध की बोतले लिए
हर दरवाज़े पर दस्तक देती
घूमती है ज़िंदगी
ताकि गहरी नींद में सोनेवालों
को जगाने के लिए
एक प्याला चाय बन सके

स्टेशन के प्लॅटफॉर्म पर
हाथो में ब्रश और कपड़ा लिए
आँखों में आधी नींद भरी
मुख पर थोड़ा काला पोलिश बिखेर
बैठ जाती है ज़िंदगी
और इंतज़ार करती है
किसी सफेद पॉश के जुते साफ़ हो
और मेरे घर का चूल्हा जले

ट्रॅफिक सिग्नल पर
होठों पे मुस्कान
और आँखों में आस लिए
अख़बार  बेचती हुई
भागती है ज़िंदगी
गाडोयोँ के पीछे

खुद की परवाह किए बिना
सोचती है मिर्च मसाला खबर बिके
और उसके घर में तेल आए
तो वो भी कुछ पढ़ सके
दिये के नीचे…..

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तुमसे हूँ मैं और मुझसे हो तुम – ज़िंदगी

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तुमसे हूँ मैं और मुझसे हो तुम वरना तो सब अधूरा 
यही लफ्ज़ बार बार मूड कर हमसे ज़िंदगी कहेती है | 

 

 

सुनो तुम मेरा गीत और मैं तुम्हारी धड़कन में बस जाउँ
बन जाए ऐसी धुन जिस में जीवन की नदिया मिलती है | 

 

 

साँसों में उसकी खुशबू घुली सी , ज़ुबान पर बन मिठास
आँखों में नमकिन सा पानी का झरना बन के रहती है | 

 

 

वैसे  कदम से कदम मिलाकर चलती ,पल पल का बंधन
जब  ज़रूरत महसूस होता साथ,तो  नज़रों से छिपती है | 

 

 

पशेमा पशेमा हो ये मन ढूंढता है उसे अंधेरो उजालो में
किसी कोने से झाकति ,मंद मुस्काती खिलती,बहती है |

 

 

 

 

 

 

 

 

चाह कर भी रूक नही सकता

चाह कर भी रूक नही सकता अमर वो वक़्त हूँ
छाया मिले निज संसार मैं धूप खड़ा दरख़्त हूँ
सब कुछ पाकर भी चैन कहा भागती है हसरते
 ज़ीले मन मर्जी  लौट ने वाला लम्हा फक़्त हूँ |

रिवाइवल

कुछ लोगो की टीम
ग्लव्स में खून से सने हाथ
महसूस करते है खून  की गर्माहट को
किसी ज़िंदगी को बचाने की कोशिश
नब्ज़ की धीमी रफ़्तार,साँसों की उलझन
उसकी रुकती धड़कन मौत की सीढ़िया चढ़ती,
हमारी भागती धड़कन ,और तेज 
होती है उसे पकड़ने के लिए
ऑक्सिजन,इनट्यूबेशन
ब्लड की लाइन,लाइफ सेविंग इंजेक्षन्स
सी.पी.आर,कारडीयाक शॉक्स
.सी.में छूटते पसीने
दस मिनट से आधे घंटे तक की ये लढाई

मौत से जीतने की कोशिश
किसी ज़िंदगी को महफूज़ रखने के लिए
उसके साथ पल पल मरती कई ज़िंदगियाँ
कभी  कामयाबी मिलती है 
कभी मौत का पलड़ा भारी
और सब खामोश….
अब तो आदत सी हो गयी है 

मौत से दो हाथ करने की
वो हस कर ज़िंदगी ले जाती है
हर बार,अक्सर
और हमे सवेदना हीन बना जाती है

(

 

 

 

आज मौत का सामना पोस्ट पढ़ी,यूही ख़याल आया हम तो  जाने कितनी बार
,
कभी कभी रोज इस पल का सामना करते है, जाने कितनी बार मौत से लढ़ते है,
कभी जीत होती है,अक्सर हार भी,कबुल इंतना करते है की कोशिश जी तोड़ होती है,
जीत का जश्न भी होता है,मगर खामोशी का अफ़सोस करने के लिए शायद समय नही 
होता,कोई और ज़िंदगी इंतजार कर रही होती है,और हम खुद को सवेदना हीन होने
का गुनहगार समझ कर आगे निकल जाते है | )

 

 

 

तेरे वजूद का एहसास

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अपने आप में खोई,अकेली ही खड़ी थी | न जाने किस सोच में डूबी थी | 
लंबे घने गेसुओं को उसकी ,बहती हवा भी छूने को मचल पड़ी | कभी यूही 
ल़हेरा के छोड़ देती,कभी एक लट का टुकड़ा उसकी मुख मंडल पर रख देती | 
मगर वह  ईन अटखेलियों  से जुदा बनी रही | जान बुझ कर या अनजाने में
शायद उसे भी नही पता था | 

     सूरज की गुनगुनी धूप में उसका चहेरा जगमगा तो रहा था,मगर उस पर कोई 
भाव नही परावर्तित हो रहे थे | लगा एक कदम आगे बढ़कर क्यूँ न गुफ्तगू कर ले |
उसकी तल्लिनता भंग करने का साहस नही जुटा पाई | क्या वह खूबसूरत तराशा 
हुआ बुत मात्र है,जो जीवित हो कर भी सवेदना हीन होती है | नही ऐसी तो कोई बात 
नही लग रही |

  चाहे उसपर किसी और बात का असर न हो रहा हो,बदलते रुत का,मौसम के
 रुख़ का असर हो रहा था | जैसे उसके दिलदार का पैगाम हो उन में,और वह हर
बात सुनकर ,मुख की बदलती रंग छटा से  उसका जवाब दे रही हो |

   कही से अचानक ही रुई से लबालब बादल इकट्ठा होने लगे थे | उसके मुख की
रेखायें तनी सी खीची सी लगने लगी | हल्का गुलाबी गोरा रंग उनके काले स्याह
रंग में घुल गया | कुछ ज़ोर ज़ोर की आवाज़े और उसका बढ़ता तनाव,जैसे
सारे जहाँ की चीता में डूब गयी हो | ज़्यादा देर नही चला ये सब,किसी ने रुई की
फाहो को निचोड़ दिया होगा | उस में भरा पानी छम छम करता धरा की गोद में बहने
लगा | पैरों के नीचे से गुज़रते ठंडे स्पर्श ने उस पर सम्मोहन सा जगाया ,या सवेदना
का चुबक लगाया न जानू | वह मदहोश सी मुस्कुरा उठी |

    जब बादलों के पर्दों से किरनो का रथ निकला ,सारी सृष्टि पाचू के रंग सज गयी |
सुरभी के सुवास से मन पटल के द्वार खोल दिए | गगन का इंद्रधनु पूरे क्षितिज पर 
बिखर  पड़ा | फूलों पर जमी बूँदों में खुद को निहारती वह खिलखिला कर हस दी |
उसके हर बदलते रूप और भाव के साथ मैं भी जुड़ गयी थी अब तक | साथ कुछ पल
का ही ,एक रिश्ते में बदल गया हो जैसे | वो जैसी भी है मैं ने अपना लिया उसे | कभी
मासूम बच्चे सी ज़िद करती है,कभी अल्लड़ सी दौड़ती है,कभी समझदारी की बातें भी 
करती है | वो है तो मेरा ही हिस्सा | तुमसे मुझे प्यार है नाआशना | ज़िंदगी मुझे  
तेरे वजूद का एहसास है अभी |

कठपुतली का खेल

जनमानस सब जिंदा तो है

पर मन की भावनाए मरी हुई

बाहरी काया ही आकर्षित करती

आत्मा दबी,जैसे कठपुतली सजी हुई

किसिका किसीसे ना कोई लेना देना

बस अपनी ताल में नाच नाचना

खुद के लिए ही भला सोचना

स्वार्थ के लिए दूसरे को बेचना

कोई मुसीबत में है तो क्या ?

राम जाने,उसका क्या हो,खुद बचना

जो है आज की दौलत का कुबेर धनी

उसके साथ ही दोस्ताना बनता अपना

जाने किस दिन वो सूरज निकलेगा

होगा इंसान से इंसान का सच्चा मेल

वरना तो धागो से बंधे नाच रहे

जीवन का ये कठपुतली का खेल.