जुगनू बन कर जागता है कोई

काली घटाओं के पर्दे से झाकता है कोई 
अध खुले उन नयनो से ताकता  है कोई |

हम तो अनजान बन गुजर जाते मोड़ से
बावरा ये मन क्यों काफिर भागता है वही |
दर्पण से कुछ पूछू वो जवाब नही देता
मालूम नही चल रही क्या रास्ता है सही |
  

 

 

 

 

 

गवाह –दिल कहते मिली उनको मंज़िल
उस अजनबी रूह से अपना वास्ता है कोई |


 

 

 

अपनो के जज़्बात जहाँ लोग समझे नही
हमारे लिए जुगनू बन कर जागता है कोई |

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अंधेरे से उजाले तक

है ना बहुत गहरा अंधेरा है,
तेरे आसपास का कुछ भी
दिखाई नही दे रहा
झुंझलाहट,क़ैद का आभास
अंधेरों में गुम होती आवाज़े
कोई रोशनदान भी नही
अगर तुम महसूस करोगे
सब की हालत तेरे जैसी है
कोई मद्दत के लिए नही आएगा
इधर उधर टुकूर -२  क्या देख रहे हो
मैं हूँ,तुम्हारे अंदर का चिराग
थोडिसी हिम्मत कर,जलाओ मुझे
धुआँ उठेगा,साँस चढ जाएगी
पर साथ थोड़ी रौशनी भी आएगी
वही तुम्हे राह दिखाएगी
अंधेरों से उजाले तक का
तुम्हारे अस्तित्व का सफ़र
तय करने के लिए….

 

 

मृगतृष्णा

कभी ख़त्म ना होनेवाला रेगिस्तान हो जैसे
अक्सर हमे जीवन के पल प्रतीत होते है ऐसे
उँचे तूफ़ानो के बवंडर ,दिल को झेले ना जाए
पराकाष्ठा हो प्रयत्नो की,पर वो थम ना पाए

रेत के नन्हे से कन हवाओ में उड़ते रहते है
हाथों पर ,पैरो पर,गालों पर ,होठों और नयनो पे
एक जुट होकर,सिमटकर, चिपक के बैठे रहते है
कोलाहल,अंतरंग शोर, मचा देते है छोटे से मन में

मन के पूरे बल से तूफ़ानो का सामना करना
अपनी दिशा कौनसी,किस और ये ग्यात करना
रेत के टीलो को बनाकर सहारा कभी लेना आराम
नयी उमीद की किरण दिखला जाए जरा सा विराम

चलते रहना हमेशा उस चमकीली ज़मीन की और
मृगतृष्णा हरा चाहे हो धोखा मगर जगाता एक आस
बरसात होगी तपती रेत पर , स्वप्न नज़र आए साथ
मंज़िल तक पहुँच जाएँगे,बुझेगी तकलीफ़ों की प्यास .

http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_7282.html#mahak

कुछ यूँ ही

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1..  जब संग तुम्हारे होती हूँ सनम 
      ज़िंदगी की मंज़िले और भी करीब नज़र आती है  |

2,, ये तन्हा रहने की ज़िद्द कबसे करने लगी हो 
      नदिया को एक दिन सागर में समा जाना है.  |

3,, एक तस्वीर बनाई है तुम्हारी दिल में 
     अपने तकदीर की लकीरों से 
     इंतज़ार कर रही हूँ चित्रकार 
    तुम आओ,और प्यार के रंग भर दो  | 

4,, हम तो अजनबी थे यहाँ पर एक दिन 
      अब सब कुछ अपना सा लगने लगा है 
      आपके रंग में ऐसे रंग लिया खुद को 
      हमारे ख्वाहिशों का घर भी सजने लगा है.  |

5,,  अब दिल में बस ये तमन्ना  है बाकी 
      जाम छोड़ के मुझे साथ लेजा तू साकी  |

6,,  यादे धुंधली हो कर भुलाई जाती है वक़्त के साथ 
      किसी  की और हमारे रुख़ बदल जाते है वक़्त के साथ 
      जो कभी दिलजान से ज़्यादा अज़ीज़ हुआ करते थे 
      वो भी पराए हो जाते है  हमसे वक़्त के साथ.  |

ख्वाब

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ख्वाब

अँखियों की  पलकों में समाए ये रहते
मन में छिपी बातों को हमसे ये कहते
कुछ स्याह कुछ इंद्रधनु से रंगीन ये ख्वाब |

नींद में कितने बन जाते ये अपने से
खुल जाए जो चक्षु  हो गये पराए वे
कुछ पाकर कुछ हाथों से ओझल ये ख्वाब |

ख्वाबों में जीना अक्सर ज़रूरी होता है
समझ कर उन्हे पाना मुश्किल होता है
दिखाते है अरमानो को मंज़िल ये ख्वाब |

ख्वाबो पर अपना हर पल निर्भर ना हो
अक्स छोड़ परछाई दिखाए वो दर्पण ना हो
कुछ खिलते कुछ खुद से बोझिल ये ख्वाब |

हाइकू – समय

हिन्दी में हाइकू लिखने का हमारा ये पहला प्रयास है|

हाइकू – समय

1. रोकना चाहती हूँ                         6. दिल के जज़्बात
समय मुठ्ठी में                                    समय रहते कह दो
    भागता जाए                                      नयना बरसे

2. रेत का  टीला                               7. काम जो करता
    समय का रेला                                 समय को महत्व देता
    फिसलता जाए                                 लक्ष्मी विराजे

3. घड़ी की टिक टिक                       8. इतिहास दोहराता
    समय की कमतरता                         गुजरा समय फिर लाता
    धड़काने तेज़                                     घूमता कालचक्र

4. किसिका नही होता                       9. ज़िंदगी के पहिए
    समय अकेला चलता                         समय की रफ़्तार
    हर क्षण अनमोल                              निशाना मंज़िल

5. किसिको नही मिलता                   10. तूफा को मोड़ दे
    समय से पहले                                   समय में बल है
    खेल नसीबका                                     मेहनत ज़रूरी.

   

apni apni manzile

ये दुनिया एक विशाल सागर
हम बसे हे इसकी कन कन में
सुख दुख तो आते जाते रेहते
जीवन बदले हर एक क्षण में

संग हमारे कितने रिश्ते नाते
हर वक़्त हमे ख़ुशियाँ देते
जैसे ही हम उदास होते
अपने ये ,हमारे आँसू भी पी जाते

पर फिर भी कभी अकेले
बुन कर ख्वाब सज़ीले
तलाशते रेहते हम यहाँ
नई अपनी अपनी मंज़िले