बरसाती ख़याल कुछ यू भी

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मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |

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ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

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मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |

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सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
बूंदो  के झुमके  पहन भीग रही छत पे |

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बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’  के  नैना |

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