आस

रुके थे कभी
ज़िंदगी की राहो पर
राह देखी थी तुम्हारी
हर दिन,हर रात
हर लम्हा,हर घड़ी
बेसुद से खड़े रहे
हर आने जाने वाले को
पूछा, कही उन्हे तू नज़र आया
किसीने देखा हो तेरा साया
किसी को पता हो अगर
तुझ तक पहुँचे जो डगर
पर कोई जवाब नही
एक हमारे सिवा
किसी को तू याद नही
तेरी तलाश में आख़िर
हम खुद चल दिए
इस गली से उस गली
मुसाफिर बन लिए
आज तक चल ही रहे है
बस एक उमिद में
के किसी मोड़ पर
शायद तुम नज़र आओ
फिर दुबारा  जमी पर ही
तुम हमे मिल जाओ…………

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चँदनी रात है आभी जाओ

चँदनी रात है

नींबुआ के पीछे छुपा बैठा जो
मध्यम मध्यम मुस्कुराता रहता वो
मेरे सलोने चाँद से सजना
मैं हूँ कितनी पशेमा पशेमा
आज दिल की जमी पर, उतर कर आभी जाओ
चँदनी रात है , अपनी चँदनी तो बरसाओ |

फ़िज़ाए तुमको बुला रही है
रजनीगंधा भी महक रही है
बादलों के पर्दे ज़रा हटाओ
बहकता समा है,नज़र तो आओ
आज दिल की जमी पर, उतर कर आभी जाओ
चँदनी रात है,कोई माधुर रागिनी सूनाओ |

कल तुम चकोर बन जाओगे
अमावस पर गुम हो जाओगे
आज फिर पौर्निमा खिली है
चाँद से चँदनी मिली है
आज दिल की जमी पर, उतर कर आभी जाओ
चँदनी रात है,किरनो की बाहो में छुपाओ |

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