मन की आशायें

मन की आशायें भी
बड़ी अजीब होती है
शाम ढलते ही नीम तले
जाकर खड़ी हो गई
सोचती है गर टहनी टूटी तो
उसपर बैठा चाँद
उनकी झोली में गिरेगा |

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कल हमने चाँद को देखा
बादलों की चादर से झाकता ,मुस्काता
,फिर छुप जाता
बार बार यही हरकत दोहराता
शाम ढल रही थी वही
सूरज डूब रहा  था दूसरे छोर
निशा की पायल खनकी
मगर वो शरारती बाज ना आया
हमसा ही कह रहा था
सोने दो ना और पाँच मिनिट बाकी है
रात होने में अभी….

दो हाइकू

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सुबह की पायल खनकते ही,निशा की गोद से उठकर
हम अक्सर उनकी गोद में समा जाते है | बिन कहे ही
वो कुछ ऐसी खुशबू ले आती है,की बस,दिल खुश हो जाता है |
उस खुशबू के बिना तो पैरों के पहिए चलते ही नही |

 . चाय की चुस्की
    तेरी हाथों से बनी
     दिन सुहाना

उपरवाले ने भी ये ममता की मूरत बड़ी फुर्सत में बनाई होगी |
इतनी सहनशीलता,प्रेम,निस्वार्थ,त्यागी, और  जाने हमारे 
एहसास उन तक मिलो दूर से भी कैसे पहुँच जाते है | दिल जान 
लेता है , लफ़्ज़ों की ज़रूरत ही महसूस नही हुई कभी |

   मेरे मन के
    राज़ अनकहे से
    कैसे समझी

सच ही तो कहते है जहा उपरवाला नही जा सका,उसने मा भेज दी |

मन पखेरू उड़ जा

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मन पखेरू उड़ जा

मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस
बरस पर बरस बीत रहे पिया भए परदेस |

मिलते ही उनसे ये कहना
तुझ बिन मुश्किल है अब रहना
दिल रे , तू धर ले उनकी धड़कन का भेस 
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |

यादों से भी हुई है अनबन
छोड़ गयी हमे बना के बिरहन
एक नज़र मिलाउँ उनसे , कोई इच्छा ना शेष
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |

चिट्ठी में लिख लाना उनकी बातें
साथ लै आना मोहोब्बत की सौगाते
उसके सिवा मन तुझ को काया में नही प्रवेश
मन पखेरू उड़ जा लै  कोई संदेस |