एक चुप्पी

एक चुप्पी
हमारे लबों पर बैठी
ताले सी

चाबी का गुच्छा
तेरी अल्लड मुस्कान
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खुद से मिलना ज़रूरी होता है

दुनिया की भीड़ में खुद को ढालना  ज़रूरी होता है

 

दो पल बैठ किनारे कभी खुद से मिलना  ज़रूरी होता है |

 

 

 

दर्दधूप में जिगर जलते हुए हसना ज़रूरी होता है

 

जज़्बातों की बाढ़ बह जाए दिल से तब रोना ज़रूरी होता है |

 

 

 

उमरराहकदम में हमसफ़र होना ज़रूरी होता है

 

यहा सब को कुछ पाने के लिए कुछ खोना ज़रूरी होता है |

 

 

बदरा दीवाने

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जानते हो तुम कितना गहरा असर होता है तुम्हारा हम पर
तुम बरसते हो कही दूर और हरियाली इस पार छा जाती  है|

 

 तपती बिलखती धरा मनाए नही मानती किसी की बात
सिर्फ़ तुम्हे देख  बदरा दीवाने उस पे मुस्कान आती है |

 

क्यूँ अकेला छोड़ उस को तू मुक्त विहार करता फिरता है
तेरा धरा से बूँदों का संगम जब होता खुशहाली लाती है |

तेरे वजूद का एहसास

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अपने आप में खोई,अकेली ही खड़ी थी | न जाने किस सोच में डूबी थी | 
लंबे घने गेसुओं को उसकी ,बहती हवा भी छूने को मचल पड़ी | कभी यूही 
ल़हेरा के छोड़ देती,कभी एक लट का टुकड़ा उसकी मुख मंडल पर रख देती | 
मगर वह  ईन अटखेलियों  से जुदा बनी रही | जान बुझ कर या अनजाने में
शायद उसे भी नही पता था | 

     सूरज की गुनगुनी धूप में उसका चहेरा जगमगा तो रहा था,मगर उस पर कोई 
भाव नही परावर्तित हो रहे थे | लगा एक कदम आगे बढ़कर क्यूँ न गुफ्तगू कर ले |
उसकी तल्लिनता भंग करने का साहस नही जुटा पाई | क्या वह खूबसूरत तराशा 
हुआ बुत मात्र है,जो जीवित हो कर भी सवेदना हीन होती है | नही ऐसी तो कोई बात 
नही लग रही |

  चाहे उसपर किसी और बात का असर न हो रहा हो,बदलते रुत का,मौसम के
 रुख़ का असर हो रहा था | जैसे उसके दिलदार का पैगाम हो उन में,और वह हर
बात सुनकर ,मुख की बदलती रंग छटा से  उसका जवाब दे रही हो |

   कही से अचानक ही रुई से लबालब बादल इकट्ठा होने लगे थे | उसके मुख की
रेखायें तनी सी खीची सी लगने लगी | हल्का गुलाबी गोरा रंग उनके काले स्याह
रंग में घुल गया | कुछ ज़ोर ज़ोर की आवाज़े और उसका बढ़ता तनाव,जैसे
सारे जहाँ की चीता में डूब गयी हो | ज़्यादा देर नही चला ये सब,किसी ने रुई की
फाहो को निचोड़ दिया होगा | उस में भरा पानी छम छम करता धरा की गोद में बहने
लगा | पैरों के नीचे से गुज़रते ठंडे स्पर्श ने उस पर सम्मोहन सा जगाया ,या सवेदना
का चुबक लगाया न जानू | वह मदहोश सी मुस्कुरा उठी |

    जब बादलों के पर्दों से किरनो का रथ निकला ,सारी सृष्टि पाचू के रंग सज गयी |
सुरभी के सुवास से मन पटल के द्वार खोल दिए | गगन का इंद्रधनु पूरे क्षितिज पर 
बिखर  पड़ा | फूलों पर जमी बूँदों में खुद को निहारती वह खिलखिला कर हस दी |
उसके हर बदलते रूप और भाव के साथ मैं भी जुड़ गयी थी अब तक | साथ कुछ पल
का ही ,एक रिश्ते में बदल गया हो जैसे | वो जैसी भी है मैं ने अपना लिया उसे | कभी
मासूम बच्चे सी ज़िद करती है,कभी अल्लड़ सी दौड़ती है,कभी समझदारी की बातें भी 
करती है | वो है तो मेरा ही हिस्सा | तुमसे मुझे प्यार है नाआशना | ज़िंदगी मुझे  
तेरे वजूद का एहसास है अभी |

कुछ दिल से

कुछ दिल से 

१. वैसे तो आपकी हर अदा से वाकिफ़ है दिलदारा 
   डरते है जब इश्क़ में इम्तेहान  देने की बात हो |

२. जब तक न तुमसे बातें हो दिल-ए-ग़ुरबत सुकून नही पाता 
   बार- २ दोहराओ वादा-ए-इश्क़,तब तक उसे यकीन नही आता |

३. बैचेनियों के तूफान क्यों उठते है दिल में हर वक़्त 
    तेरी एक नज़र बस ,इत्मीनान से थम जाया करते है |

४. रात की नींद भी सुहानी बने जो तू ख्वाब में आ जाए
     कोई सवाल मुश्किल नही ज़िंदगी का जो तू जवाब दे जाए |

५. तेरी मुस्कान को देख कर,हम भी रोज हंस लेते है
    तुझ से बातें करने संगदिल मगर बहुत तरस जाते है | 

मुस्कान

मुस्कान

खिली खिली सी नज़र आती
सब को ये लुभाती
कभी धीमी कभी चंचल सी
लबो पर ये बिखर जाती
कभी सिर्फ़ तेरी आँखों मे
स्मीत बन के चमके
कभी चाँद से चेहरे पे
मुस्कान बन के दमके