यूही शाम ढलते

यूही शाम ढलते तेरा चुपके से आना

परदे के पीछे खड़ी होकर मासूम मुस्कुराना

 

चाय का लुत्फ़ लेता अख़बार में खोया मैं

हवाओ संग लफ़्ज़ों का कानो में गुनगुनाना

 

हक़ीक़त थी तुम कभी,आज वक़्त का साया हो

याद बहुत आए तेरा दिल पे दस्तक दे जाना

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मुस्कुराहट के गुलाब

मुस्कुराहट के गुलाब

मुस्कुराहटसे सजे जो लब , नूर-ए-शबाब खिले है
एक मुस्कुराहट में हमारी , हज़ारो गुलाब मिले है |

हमारी मुस्कुराहटसे सबको , नशे चढ जाते है
कोई होश में आने से पहले, हम फिर मुस्करा लेते है |

मुस्कुराहट को एक बार तू चख ले जाहिल
जहर-ए-जाम भी ये अमृत बना देते है |

दीदार

दीदार

खुश है मेरी बन्नो,आज मधुचंद्र की रात
सज   कर बैठी है
नही करती किसीसे बात

कुछ भी कहो ,गुलाब सी शरमाए 
पलकों को झुकाए,नयनो से मुस्कुराए

शायद मेरी बन्नो,थोड़ी सी इतराए
पवन के छूअन से भी,थोड़ी सी सहराए 

मुखमंडल पर उसकी,चँदनी का तेज
रंगबिरंगी फूलों से महेकती उसकी सेज

ओढ़ के घूँघट हया का
अपने साजन का करती इंतज़ार

हम भी अब चले यहा से
के बन्ना आया है करने
दुल्हने चाँद का दीदार.

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