तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

सावन  के पानी में छप छप करना

किसी के मुख मुस्कान वास्ते जानबूझ

 कीचड़ में फिसलना

वो हर्ष के धब्बे  उठे मौजूद है

मन की काँच पर आज भी

 

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दूर नभ में स्थित हो

मन मचलता है तुम्हे पाने

थाली में पानी सजाकर

तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

उस में खुद को निहार के

चाँद और हमारा अक्स

ऐसे ही मिला लेती हूँ…..

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सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार

नीले नभ की छुपी नीलाई
शामल घटाए उस पर छाई
बदरा उमड़ घूमड़ कर आई
अपनी संगिनी को रहे पुकार
इठलाती,बलखाती थिरकत ताल
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

अपनी आने की आहट बताए
प्रकाश चमकती लकीरे बिखराए
खुश होती वो जब ये देखती
इंसानो में अब भी बसता प्यार
बदरा से करती इश्क़ इज़हार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

कोई सृजन पीड़ित नज़र आए
त्रिनेत्र को गहरी नींद से जगाए
करती उनके संग तांडव नृत्य
जब तक असत्य को ना जलाए
ख़त्म करना चाहे धरासे अत्याचार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

सत्य,अहिंसा विजयी हो जाए
सब के संग तब वो जश्न मनाए
हरित क्रांति का संदेसा पहुँचाती
बदरा से कहती अब बरसाए
शीतल बूँदो की मधुरस फुहार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

चाहे जितना हो उन में अंगार
बिजली नभ का गहना शृंगार
बिजली बिन बदरा लगे अधूरे
मिलकर दोनो करे सपने साकार
जीवन को दिलाए नया आकार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/01/2008_31.html#mahak

नभ आज दारी आले

नभ आज दारी आले

वेड्या मनास कोण समजावी
उंच उडाले निळ्या आकाशी
सोडून मला एकटेच भरकटले
कदाचित मग थोडे घाबरले
परतिचि मनास वाट दाखवण्या
नभ आज माझ्या दारी आले.

सांगून ते एकते कोणाचे
विचार मांडते सतत स्वतःचे
कितीही त्यास जखडून ठेवा
पण ते पळते , हरवते
परतिचि मनास वाट दाखवण्या
नभ आज माझ्या दारी आले.

जाणत नाही जगाची रीत
मिसळून राहणे हीच प्रित
एकटेच ते गुंगते , रमते
आकाश दुलईत दडपुन जाते
परतिचि मनास वाट दाखवण्या
नभ आज माझ्या दारी आले.

मेघा बरसो रे आज

मेघा बरसो रे आज

मौसम बदल रहा है ,एक नया अंदाज़ लाया
बहती फ़िज़ायो संग रसिया का संदेसा आया
आसमान पर बिखरे सात रंग
रोमांचित,पुलकित,मैं हूँ दन्ग
भिगाना चाहूं इन खुशियों में तनमन से
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

वादीया भी तुमको,आवाज़ दे रही है
हवाए लहेराकर अपना साज़ दे रही है
घटाओ का जमघट हुआ है
रसिया का आना हुआ है
भीगना चाहती हूँ रसिया की अगन मे
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |

हरे पन्नो पर बूँदे बज रही है
मिलन की बेला मैं अवनी सज रही है
थय थय मन मयूर नाच रहे है
पूरे हुए सपने,जो अरसो साथ रहे है
भीगना चाहती हूँ,प्यार के सावन में
मेघा बरसो रे आज बरसो रे |