सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार

नीले नभ की छुपी नीलाई
शामल घटाए उस पर छाई
बदरा उमड़ घूमड़ कर आई
अपनी संगिनी को रहे पुकार
इठलाती,बलखाती थिरकत ताल
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

अपनी आने की आहट बताए
प्रकाश चमकती लकीरे बिखराए
खुश होती वो जब ये देखती
इंसानो में अब भी बसता प्यार
बदरा से करती इश्क़ इज़हार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

कोई सृजन पीड़ित नज़र आए
त्रिनेत्र को गहरी नींद से जगाए
करती उनके संग तांडव नृत्य
जब तक असत्य को ना जलाए
ख़त्म करना चाहे धरासे अत्याचार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

सत्य,अहिंसा विजयी हो जाए
सब के संग तब वो जश्न मनाए
हरित क्रांति का संदेसा पहुँचाती
बदरा से कहती अब बरसाए
शीतल बूँदो की मधुरस फुहार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |

चाहे जितना हो उन में अंगार
बिजली नभ का गहना शृंगार
बिजली बिन बदरा लगे अधूरे
मिलकर दोनो करे सपने साकार
जीवन को दिलाए नया आकार
सुनाती बिजलियाँ अपनी झंकार |
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/01/2008_31.html#mahak

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नारी तुझ पर संसार गर्विता

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तन चंचला
मन निर्मला
व्यवहार कुशला 
भाषा कोला
सदैव समर्पिता |

नदिया सा चलना
सागर से मिलना
खुद को भुलाकर भी
अपना अस्तित्व सभलना
रौशन अस्मिता |

सृष्टि की जननी
प्रेम रूप धारिणी
शक्ति सहारिणी
सबल कार्यकारिणी
अन्नपूर्णा अर्पिता. |

मूरत ममता
प्रचंड क्षमता
प्रमाणित विधायक
सौजन्य विनायक
अखंड सहनशीलता |

आज का युग तेरा है परिणीता
नारी तुझ पर संसार गर्विता |

हमारी सारी बहनो और साहिलियों को नारी दिवस की हार्दिक शूभेच्छा.

दिल के जज़्बात

   

 हाथों में उठाए काग़ज़ और क़लम
लिख देते है दिल के जज़्बातों को
खुद के  ही अल्फ़ाज़ कभी पक्के ,कभी कच्चे से लगते है |

कल्पनाओ को मन के नया रूप मिलता
जी लेते है अपने उन सिमटे ख्वाबों को
भावनाओ में बहेते तरंग कभी झूठे ,कभी सच्चे से लगते है |

अक्सर निकलती वो मोहोब्बत की बातें
कभी दोहराते मजबूत ,बुलंद इरादों को
हम चाहे जो भी लफ्ज़ पिरोए,मन  को अच्छे ही लगते है |

बहुत अरमानो से सजाते और सवारते है
बेंइन्तहा चाहते है अपनी कविताओं को
जैसे हर मा को सबमें खूबसूरत अपने बच्चे ही लगते है |

आई है बसंत बहार

 

 आई है बसंत बहार

सर्द हवाए सुस्ताने लगी
कोहरा भी धुआँ धुआँ
कनक सी कीरने जाल बुनती
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

हर शाख पत्तियो से सजी
बेल हरियाली लहराने लगी
गुलमोहर का चमन खिला
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

झूलो की लंबी कतार
चहेरे पर हँसी फुहार
सखियो संग नचू मनसे
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

फुलो की महक छाई
समीरा मंद मंद बहे
पिहु की पाती लाए
कोयल गात नीत राग मल्हार
के अब आई है बसंत बहार |

सर्व श्रेष्टदान

श्रेष्ठदान

मनुष्य का जो जीवन मिला है
समझो इस जनम भाग्य खिला है
एक पाप के लिए जब कोई सात जनम जले
एक मनुष्य जीवन तब पुण्य से मिले
सब अपना कर्म और कर्तव्य करते है
सब धर्म और संस्कारो का पालन करते है
कभी सच और झूठ में उलझे रहते है
कभी आनंद और गम में झूलते रहते है
अपने अच्छे ,बुरे व्यवहार का चिट्ठा लिए
इस जीवन रूपी गंगा में बहते है
जो मिला है उसमें दूसरेकी सहयता करू
इस औपचारिकता को दान कहते है
सच्चा दानवीर गुप्त दान करता है
दूजा ढिंढोरा पीट खुदको महान कहता है
किसीने भगवान को चढ़ावा चढ़ाया
किसीने ग़रीब को खाना खिलाया
मन में सब संतुष्ट होते है
चलो इस जीवन थोड़ा पुण्य कमाया
दान करना बड़ी नेक बात है
दान में भगवान का अंश समाया
एक और बात सब समझ ले
दान के लिए अनमोल कुछ है,जान ले
दान वो करे, दूसरे को पूरा जीवन दे जाए
दान वो करे , मरकर हम जहाँ में रह जाए
एक दान से सात जन्मो का पुण्य कमालेना
अगले सात जन्मो तक का सुकून पा लेना
अपना जीवन पूरी खुशियों से जी लेना
जाते हुए अपनी कवल निगाहे दान करा देना
किसिके अंधेरे जीवन में दीप रौशन होंगे
किसीकि बगिया में नये गुल खिलेंगे
कोई और ये रंगबिरंगी दुनिया देख पाएगा
किसी की जबा पर सदैव आपका नाम आएगा
सर्व श्रेष्टदान वही जो दिखाए किसिको सृष्टि
सर्व श्रेष्टदान वही करता, जो दे जाए अपनी दृष्टि.

ग़ज़लो की दीवानी

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   ग़ज़लो की दीवानी

आज कल पग पग निशानी
मैं बस ग़ज़ल सोचती जाउ
किसी पल तुम देखो मुझको
मैं बस ग़ज़ल तलाशती पाउ |

ना जाने ये कैसा खुमार है
मुझे इससे कब इनकार है
ग़ज़ल  बन रहा मेरा जीवन 
मुझे इससे अब इकरार है |

जिस गली भी लगा शामियाना
तखलूस हो रही ग़ज़ल जहा पर
कही और ढूँढने की नही ज़रूरत
मुझे भी तुम पाओगे वहा पर |

दिल से सुनती हूँ ग़ज़ल को
दिल से अपनाती हर लफ्ज़ को
भारी उर्दू अल्फ़ाज़ जो ना समझू
दिल से कोई अर्थ लगाती उनको |

हम तो बस इतना ही जानते
शेर जोड़ कर ग़ज़ल है बुनते
काफिया,बहर,मतला,रदिक
ये  सब हम  नही  समझते |

हम  भी  ये सब  सीखना चाहे
ताकि खालिस ग़ज़ल लिख पाए
हम भी खुदकी  महफ़िल सजाए
और ग़ज़लो की दीवानी कहलाए.|

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हम तुम

हम तुम
अलग अलग
दो तन
एक मन
बाहों में
ये कंपन
हमारी तुम्हारी
बढ़ती धड़कन

हम फूल 
तुम खुशबू 
इन फ़िज़ायों संग
हो जाए रूबरू

हम घटा
तुम सावन
आओ बरस जाए
प्यासी धरती
तृष्णा मिटाए

हम दीप
तुम बाति
मिलकर जल जाए
प्यार की ज्योति
रोशन कराए

हम नींद
तुम ख्वाब 
कर ले सारे
अरमान पूरे
कोई सपने
ना रहे अधूरे

हम सुर
तुम गीत
छेड़े साज़
सजाए प्रीत
एक धुन
बन जाए मीत

हम वफ़ा
तुम कसम
आज निभाए
ये रसम
होंगे ना जुदा
सजनी साजन

हम तुम
एक रंग
सदा रहे
संग संग.

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