काहे तूने मटकी तोड़ी

काहे तूने मटकी तोड़ी

वृंदावन में फिर एक नयी सुबह खिली
सारी गोपिया पनिया भरन को चली

राह भर बतियाती इतराती चलती
कान्हा के गुणगान,शराराते बयान करती

दूर कही से नटखट कान्हा आए
कंकर से मटकी पर निशाना लगाए

एक ही वार में सारी मटकी फोड़ी
गोपिया पूछती,काहे तूने मटकी तोड़ी

यशोदा मैय्या को,शिकायत करवाएँगी
कान्हा को रस्सी से बन्धवाएँगी

कान्हा कहे,गोपियों मैं तुमसे रूठ जाउ
कसम से अब कभी बाँसुरी ना बजाउ

यह सुनकर गोपिया घबराए
बिन बाँसुरी रासलीला कैसे रचाए

सारी सखियाँ कान्हा को मनाए
नटखट चाहे तू हमे रोज़ सताए

बीनती करती ,बासुरी रोज़ बजाए
मधु धुन से सारे ब्रिज को सजाए.

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यमुना के तट पर

यमुना के तट पर
गोपियों का जमघट
वस्त्राभूषण रख कर
जलक्रीड़ा करती सब.
नटखट कान्हा आए
छुपता दबे पाव तब
देखे गोपिया है मगन
शरारत करने मचला मन
वस्त्राभूषण के साथ
एक पेड़ पर छिप गया
बहोत देर बाद
गोपियों के ध्यान आया
कान्हा को सब पुकारती
वस्त्राभूषण वापस दो कहती
हम सब बाहर कैसे आएँगी
नंदनवन वापस कैसे जाएँगी
कान्हा बोले मैं मान जाउ
पर अपनी एक शर्त मनाउ
यशोदा मैय्या से शिकायत ना करना
चाहे जितना मैं माखन चुराउ
मंज़ूर कह गोपिया शरमाई
नन्हा कान्हा,पर धूम मचाई.