चाहत है एक दिन अमीर बनू

चाहत है एक दिन अमीर बनू
सौ गुन वाला कड़वा नीम बनू |

ज़िंदगी का गहरा भंवर देखा
मोह से अनजान फकीर बनू |

दर्द बहुत दिए अपनो को
मरहम लगाता हकीम बनू |

झूठे आसुओं से लुटा जहाँ
मन को संभाले वो नीर बनू |

कर्ज़ कितना चढ़ा मिट्टी का
मर के भी अमर शहीद बनू |

भंवरों सी फूलों में छुपी ‘महक’
कंवल से खिला झील बनू |

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मन की आशायें

मन की आशायें भी
बड़ी अजीब होती है
शाम ढलते ही नीम तले
जाकर खड़ी हो गई
सोचती है गर टहनी टूटी तो
उसपर बैठा चाँद
उनकी झोली में गिरेगा |

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कल हमने चाँद को देखा
बादलों की चादर से झाकता ,मुस्काता
,फिर छुप जाता
बार बार यही हरकत दोहराता
शाम ढल रही थी वही
सूरज डूब रहा  था दूसरे छोर
निशा की पायल खनकी
मगर वो शरारती बाज ना आया
हमसा ही कह रहा था
सोने दो ना और पाँच मिनिट बाकी है
रात होने में अभी….