काश कुछ ऐसा होता

काश कुछ ऐसा होता

सोचती हूँ काश कुछ ऐसा होता
सब कुछ जैसा मैं चाहूं , वैसा होता |

जब मन में कोई ख्वाहिश पनपति
 लक झपकने से पहले परिपूर्ण होती |

फिर ना ही मुझे किसीसे करना पड़ता इज़हार
और ना ही करना होता किसी चीज़ का इंतज़ार \

लेकिन क्या मैं सच में खुश होती
आसानी से मिली सफलता को अपनापाती |

कभी कभी ठीक है अनजाने सफलता पाना
बिना मेहनत किए ही,हर सुख का आना |

मन क्यों फिर,खुद को ही धिक्कारता है
छोटी छोटी बातों पर नाराज़ हो जाता है |

अपने हाथो पाई छोटी चीज़,बहुत बड़ी होती है
वही सच्ची खुशियाँ है,जो उसके बाद आती है |

इस लफ्ज़ ‘काश’ से,कभी ज़िंदगी उलझती है
और लफ्ज़ ‘काश’ से,सपनो की राहे सुलझती है |

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दीदार

दीदार

खुश है मेरी बन्नो,आज मधुचंद्र की रात
सज   कर बैठी है
नही करती किसीसे बात

कुछ भी कहो ,गुलाब सी शरमाए 
पलकों को झुकाए,नयनो से मुस्कुराए

शायद मेरी बन्नो,थोड़ी सी इतराए
पवन के छूअन से भी,थोड़ी सी सहराए 

मुखमंडल पर उसकी,चँदनी का तेज
रंगबिरंगी फूलों से महेकती उसकी सेज

ओढ़ के घूँघट हया का
अपने साजन का करती इंतज़ार

हम भी अब चले यहा से
के बन्ना आया है करने
दुल्हने चाँद का दीदार.

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