रुपहली किरनो से सजाया जो आसमान

रुपहली किरनो से सजाया जो आसमान
चाँद के बिन सितारे अधूरे  से लगते  है |

समंदर की गहराई में छुपाया जो खजाना
मोतियो  के बिन सीप अधूरे से लगते है |

इज़हार करने जाओ जो गमजमाना
आसुओ के बिन नयन अधूरे से लगते है |

महफ़िल में सजाओ जो गीतो का तराना
सुरताल  के बिन साज़ अधूरे से लगते है |

तुम हमे कितनी अज़ीज़ कैसे करे बयान
महक‘  के  बिन फूल अधूरे से लगते है |

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फूलों के बिस्तर उन्हे रास नही आया करते |


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

काटो से भरी राहे चुनकर जो चलते है अक्सर
फूलों के बिस्तर उन्हे रास नही आया करते |

इश्क़ की मुश्किल डगर जो थाम लेते एकबार
तूफ़ानो से डरकार वो वापस नही जाया करते |

जीवन की गहराई में जो सत्य रौशन कराए
झूठ के अंधेरो में वो कभी नही सोया करते |

खुदा की खुदाई पर जो जहन में भरोसा रखे
छोटिसी ठोकर से वो शक्स नही रोया करते |

रूह से रूह का रिश्ता जो जुड़ जाए कसम से
चाहे जनम बदल जाए वो टूट नही पाया करते |

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हम तुम

हम तुम
अलग अलग
दो तन
एक मन
बाहों में
ये कंपन
हमारी तुम्हारी
बढ़ती धड़कन

हम फूल 
तुम खुशबू 
इन फ़िज़ायों संग
हो जाए रूबरू

हम घटा
तुम सावन
आओ बरस जाए
प्यासी धरती
तृष्णा मिटाए

हम दीप
तुम बाति
मिलकर जल जाए
प्यार की ज्योति
रोशन कराए

हम नींद
तुम ख्वाब 
कर ले सारे
अरमान पूरे
कोई सपने
ना रहे अधूरे

हम सुर
तुम गीत
छेड़े साज़
सजाए प्रीत
एक धुन
बन जाए मीत

हम वफ़ा
तुम कसम
आज निभाए
ये रसम
होंगे ना जुदा
सजनी साजन

हम तुम
एक रंग
सदा रहे
संग संग.

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गुलमोहर

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 सी शीश है तुझमें ,खिची चली आती हूँ
साथ मेरे मन की तरंगे, तुमसे बाटने  लाती हूँ |

तुमसे मेरा रिश्ता है , मेरे बचपन सा सुहाना
तेरे रंगरूप से मोहित मैं,सुनती हूँ तेरा तराना |

फ़िज़ाओं का रंग बदले,मौसम भी बदलता रेहता
जब तूमपे बहा सजती,मेरा रोम रोम है खिलता |

ग्रीष्म ऋतु में आते हो,सावन की ख़ुशी दे जाते हो
जहाँ भी जाती हूँ मैं,मेरे मन में समाए होते हो |

ना जानू तुम कौन हो मेरे,प्रियतम या सखा हो
बेनाम ही रेहने दो ये रिश्ता,नाम में क्या रखा है |

इतना समझती हूँ मैं,बरसों का अपना अफ़साना
 जब भी तेरी छाया में,हरदम प्यार के फूल बरसाना |

ज़िंदगी की  मुश्किल राहों में , तेरे फूल चुन चुन लाती हूँ
तेरे संग होने के एहसास से ही,कितना सुकून पाती हूँ |

लालरे फूलपन्नो की चुनरी से,तेरा रूप ग़ज़ब का निखरता है
मेरे दिल के आँगन में आज भीवो गुलमो बिखरता  है |

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दीदार

दीदार

खुश है मेरी बन्नो,आज मधुचंद्र की रात
सज   कर बैठी है
नही करती किसीसे बात

कुछ भी कहो ,गुलाब सी शरमाए 
पलकों को झुकाए,नयनो से मुस्कुराए

शायद मेरी बन्नो,थोड़ी सी इतराए
पवन के छूअन से भी,थोड़ी सी सहराए 

मुखमंडल पर उसकी,चँदनी का तेज
रंगबिरंगी फूलों से महेकती उसकी सेज

ओढ़ के घूँघट हया का
अपने साजन का करती इंतज़ार

हम भी अब चले यहा से
के बन्ना आया है करने
दुल्हने चाँद का दीदार.

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