रेत पर कदम रखते ही

रेत पर कदम रखते ही , गिली रेणू के स्पर्श से
भावनाओ का सैलाब उठा ,मन की गहराई में

वो लम्हे शंख सीपी के , यही भिखरे हुए
उन्हें समेटने लगे , लहरों ने यादों का आँचल ओढाया

भरती की रात थी , पूनम का चाँद भी था
सागर पर गिरा प्रीत चांदनी का प्याला

पीछे ही भागता है , हवा के विरुद्ध दिशा में
किनारों से मौजो का रिश्ता छुटा ,कैसे समझाऊ मन रे

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भीगे स्पर्श का एहसास

सागर किनारे तक आकर आलिंगन देती ल़हेरे
आते वक़्त भर भरके तुम्हारी यादे समेट लाती है

मेरे मन में उठते हुए  हज़ारों ख़याली तूफ़ानो को
बहुत दूर  कही तो अपने साथ वापस ले जाती है

गीली रेत पर तुम्हारा नाम प्यार से लिखते समय
तुम्हारे भीगे से स्पर्श का एहसास  करा देती है