ल़हेरें

1.उठ उठ कर उँची  जाती है किनारों पर ल़हेरें
मानती है उनको किनारों से गहरा प्यार है 
लिपट कर वापस लौट जाती है चुपचाप सी 
जानती है सच्चाई,सागर उनका असली संसार है.  |

2.यूँही कभी मैं ख़याल कर जा
सोचती हूँ कोई ल़हेर बन पा
अथांग सागर में जीवन के उछलू
दूर से भी सबको नज़र  |

3.चंद्रमा सजीला
पौर्निमा की बहार
दरिया में हलचल
ल़हेरो की लगबग
सजी है आज
भरती की रात
होगी मिलन की बात
किनारो पर इंतज़ार था
प्यार के पूरे होंगे जज़्बात
कुछ पल की खुशियाँ
समेट लेंगी आचँल में
तनहाईयाँ बाटने
यादें ही काम आती है |

4.ल़हेरो को बेवजह क्यों बदनाम कर रखा है
के वो बेवक़्त तूफ़ानो का निमंत्रण लाती है
जब समंदर में राह से भटक जाए कश्ती
असीम ल़हेरें ही किनारों तक साथ देती है |

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भूमध्य असीम से सागर में

एक छोटिसी चट्टान पर खड़ी हूँ
भूमध्य असीम से सागर में
दूंढ़ रही हूँ किनारा ज़िंदगी में
जो बन जाए सहारा मुश्किलो में
जो बन जाए फुहार खुशियो में
कश्ती मेरी खो गयी साहिल पर
और अब तैरेने की कोशिश करती हूँ
जैसे हो हाथ पैर चलाते रहती हूँ
डूब जाती हूँ कभी,फिर उठती हूँ
उँची उँची लहरो से झूंजती हूँ
थोड़ी दूर तक  जाती हूँ
बेरूख़् हवाए मुझे वापस ढकेलती है
खुद को फिर उसी चट्टान पर पाति हूँ
अकेले दूर दूर नज़र घूमाति हूँ
सिर्फ़ पानी ही पानी है,और कुछ नही
वो भी खारा पानी,प्यास बुझती नही
अब निश्चल हो गयी मैं,बुत सी कोई
निहारती हूँ आसमान को एकटक
 जाए तो शायद मेरी प्यास बुझे
फिर कोई लेने आए ,उसकी आस जगे
कब आओगे तुम के बस कुछ ही प्राण बचे
एक बार तो देखु तुम्हे जी भर कर
इससे पहले की जीवन की रात सजे. |