बरसाती ख़याल कुछ यू भी

954571_f520

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से
माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली |

================================

ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली
सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली |

=================================

मौसम खुशनुमा , फ़िज़ायें भी ‘महक’ रही
तेरा नाम क्या लिया, फूलों की बरसात हुई |

=================================

सावन की फुहार से ’महक’ बावरी हुई
बूंदो  के झुमके  पहन भीग रही छत पे |

==================================

बारिश की लड़ी से नव पल्लवित रैना
इंद्रधनु के रंग उतरे ‘महक’  के  नैना |

Advertisements

तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

सावन  के पानी में छप छप करना

किसी के मुख मुस्कान वास्ते जानबूझ

 कीचड़ में फिसलना

वो हर्ष के धब्बे  उठे मौजूद है

मन की काँच पर आज भी

 

==============

 

दूर नभ में स्थित हो

मन मचलता है तुम्हे पाने

थाली में पानी सजाकर

तुम्हारा प्रतिबिंब उतार लेती हूँ

उस में खुद को निहार के

चाँद और हमारा अक्स

ऐसे ही मिला लेती हूँ…..