दीदार

दीदार

खुश है मेरी बन्नो,आज मधुचंद्र की रात
सज   कर बैठी है
नही करती किसीसे बात

कुछ भी कहो ,गुलाब सी शरमाए 
पलकों को झुकाए,नयनो से मुस्कुराए

शायद मेरी बन्नो,थोड़ी सी इतराए
पवन के छूअन से भी,थोड़ी सी सहराए 

मुखमंडल पर उसकी,चँदनी का तेज
रंगबिरंगी फूलों से महेकती उसकी सेज

ओढ़ के घूँघट हया का
अपने साजन का करती इंतज़ार

हम भी अब चले यहा से
के बन्ना आया है करने
दुल्हने चाँद का दीदार.

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babul

नयनो की जलधारा को, बह जाने दो सब कहते
पर तुम इस गंगा जमुना को मेरे बाबुल कैसे सहते
इसलिए छूपा रही हूँ दिल के एक कोने में
जहाँ तेरे संग बिताए सारे पल है रहते
होठों पर सजाई हँसी,ताकि तू ना रोए
इन आखरी लम्हों को,हम रखेंगे संजोए
आज अपनी लाड़ली की कर रहे हो बिदाई
क्या एक ही दिन मे, हो गयी हू इतनी पराई
जानू मेरे जैसा तेरा भी मन भर आया
चाहती सदा तू बना रहे मेरा साया
वादा करती हूँ निभाउंगी तेरे संस्कार
तेरे सारे सपनो को दूँगी में आकार
कैसी रीत है ये,के जाना तेरा बंधन तोड़के
क्या रह पाउंगी बाबुल, मैं तेरा दामन छोड़के.

saathi re

साथी रे

मेरे हम सफ़र,मेरे हम कदम
जब तेरा साथ हे यहाँ
मेरे सनम,तुमसे ही हे
खूबसूरत मेरा ये जहाँ
सपनोसे सजीला हो अपना आशियाँ
प्यार से भरी हो तेरी मेरी ये दुनिया
अगर कभी आए कोई तूफान
मिलकर करेंगे हम सामना
कभी ना बिछड़े अपना साथ
दिल में लिए ये कामना
चलती रहूंगी संग तेरे में
ज़िंदगी की ये अनगिनत राहे
चाहूं बस अब इतना ही
साथी रे तू भी ये कसम निभाए.